जब तक अंतरंग की शुद्ध नहीं होगी तब तक शरीर की शुद्धि काम नहीं कर सकती पूर्णमति माताजी
ग्वालियर
परमपूजनीय आर्यिका 105 पूर्णमति माताजी ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि अनादि काल से आत्मा के साथ लगे हुए क्रोध, मान, माया, लोभ तथा इंद्रिय जन्य दुष्ट वासनाओं को बढ़ाने वाले विषय भोग रूपी विष को वैराग्य या ज्ञान रूपी पानी से आत्मा के ऊपर लगे हुए कर्म फल को बारंबार धोना चाहिए। शुद्धात्म भावना को मालिन करने वाली मायाचार आदि भीतरी को भावनाओं को त्याग कर शुद्धता का प्रयत्न करना ही उराम शौच धर्म है।
माताजी ने आगे कहा कि लोग भीतरी कुवासनाओं को ना धोकर बाहरी शरीर की शुद्धि मानते हैं पर जब तक अंतरंग शुद्ध नहीं






होगी तब तक शरीर की शुद्धि काम नहीं कर सकती। इसलिए नश्वर शरीर के द्वारा आत्महत्या कर लेना उचित है। यही उत्तम शौच धर्म है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
