क्षमा का अर्थ होता है कि दूसरे से गलती हुई है और फिर क्रोध न आवे उसका नाम है उत्तम क्षमा धर्म : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

धर्म

क्षमा का अर्थ होता है कि दूसरे से गलती हुई है और फिर क्रोध न आवे उसका नाम है उत्तम क्षमा धर्म : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ परिसर में 10 लक्षण पर्व के प्रथम दिवस उत्तम क्षमा धर्म पर बोलते हुए निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्री सुधा सागर महाराज ने कहा कि त्योहार धर्मात्मा बनाता है और पर्व धर्म बनाता है। कितने त्योहार होते हैं वह किसी न किसी धर्मात्मा से जुड़े होते है, व्यक्तिगत होते है। जब जब धर्मात्मा किसी कार्य में सफल होगा, उसका जश्न मनाया जाता है जैसे दिवाली। जो जो दिन धर्म के नाम से प्रसिद्ध हो, उसे धर्म कहते है और जो जो दिन धर्मात्मा के नाम से प्रसिद्ध हो उसे त्यौहार कहते है। त्योहार के दिन माल मलीदा खाने का भाव जागता है और पर्व के दिन उपवास करने का भाव जागता है। जितना ज्यादा आप त्याग कर सकेंगे, उतना ही पर्व तुम्हारे लिए फलीभूत होगा।

 

 

 

किसी त्यौहार में सिद्धि नहीं होती और पर्व में सिद्धियां होती हैं। जो सिद्धियां 6 महीने में प्राप्त होती है, वही मंत्र पर्व के दिनों में फेरा जाए तो आठ दिन में प्राप्त हो जाती है।

 

महाराज श्री ने कहा धर्मात्मा यदि तुम्हें रहना है तो अकेले मत रहना, तुम धर्मात्मा हो तो कोई न कोई तुम्हारा फोलोवर होना चाहिए, जिंदगी में चार अंग होना चाहिए, पहला अंग कहा उपगुहन अंग-दुर्जन को माफ करना। क्षमा धर्म का अर्थ यह नहीं है कि क्षमा मांग लेना, गलती होने पर क्षमा मांगना प्रायश्चित है, वह तप है, प्रतिक्रमण है, वो धर्म नही है। क्षमा का अर्थ होता है कि दूसरे से गलती हुई है और फिर क्रोध न आवे उसका नाम है क्षमा है। क्षमा धर्म, क्रोध का विरोधी है, किस-किस कार्य में क्रोध आता है? जिसने तुम्हारे साथ अपराध किया है उसको क्षमा कर देना बहुत बड़ी बात है, उसी का नाम पारसनाथ होता है।

गलती करने वाले की सबसे बड़ी बदमाशी होती है कि वह जल्दी क्षमा मांग लेता है क्योंकि गलती मेरे से हुई है। बहादुर वो है, जो सामने वाले ने गलती की है और उसे जितने जल्दी क्षमा कर दे, उतना ही क्षमा धर्म प्रकट होता है। यदि कर सको तो करना, जिसने तुम्हारा सर्वनाश किया हो, उसके नाश करने का भाव नहीं करना, कभी शिक्षा देने के लिए दंडित करना तो उसकी मनाही नही है लेकिन अंदर से बैर भाव मत रखना। बाहर से क्या सोचना- इसको दंडित तो करना है, नहीं तो उसका कल्याण कैसे होगा?

 

जिस धर्मात्मा का कोई फॉलोअर नहीं, वो धर्मात्मा नहीं क्योंकि वह सम्यकदर्शन से विकलांग है। दूसरा प्रभावना अंग का अर्थ है कि तुम धर्मात्मा हो कि नहीं, क्या तुमने कोई ऐसा धर्म पाला है, जिसे देखकर किसी को धर्म करने का भाव आया हो। मुनि बने हो क्या तुम्हारी मुनिचर्या को देखकर किसी को मुनि बनने का भाव आया हो? तुम दानी बने हो क्या तुम्हारे दान को देखकर किसी को दान देने का भाव, तुम रात्रि भोजन त्यागी हो क्या तुम्हारे त्याग को देखकर किसी ने रात्रिभोजन त्याग का भाव किया। यदि ऐसा नहीं किया है तो आपका सम्यकदर्शन विकलांग है। प्रभावना का अर्थ यही है जो तुमने अच्छा कार्य किया है, उससे दूसरा प्रभावित है कि नहीं। किसी भी अच्छे कार्य की कसौटी यही है, क्या दूसरा अनुकरण करना चाहता है।

 

तीसरा भक्त बनाने का अंग कहा- स्थितिकरण, कोई गिर गया है उसे उठा दो, वह जिंदगी भर तुम्हारा हो जाएगा। जिसका चारों तरफ अपमान हो रहा है, तुम उसका सम्मान कर दो, वह तुम्हारा हो जाएगा जैसे दुर्योधन ने कर्ण को अपना बनाया था। नियम लो कि हम किसी के अच्छे दिनों में काम आएंगे या नहीं लेकिन संकट के दिनों में हम साथ खड़े रहेंगे। चौथा वात्सल्य अंग- अपने साधर्मियों के प्रति इतना वात्सल्य दिखाओ कि कितनी भी गलती हो जाए, उठा के गले लगाओ। घ्रणा पापी से नहीं, पाप से करो।

 

बेरी के साथ बैर भाव नहीं रखना यह समता भाव है लेकिन बेरी का बैरीपना भूल जाना और आत्मीय भाव आ जाना यह क्षमा धर्म है। रामचंद्र जी ने माँ के प्रति समता भाव नही, क्षमा भाव रखा, माँ ने कितना ही गलत किया है, हम उसको बैरी नहीं मानेंगे, माँ को माँ मानेंगे, इसका नाम है क्षमा धर्म, जो समता से भी ऊपर है।
अजय जैन लांबरदार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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