आचार्य विराग सागर जी महाराज उलझे हुए संत नही होकर सुलझे हुए संत रहे वर्धमान सागर महाराज
बांसवाड़ा।
आचार्य श्री विराग सागर जी का समाधि मरण संपूर्ण समाज के लिए दुखदाई है आचार्य विराग सागर जी जब मुनि अवस्था में थे तब भी हमसे मिलन हुआ और आचार्य बनने के बाद भी मस्तकाभिषेक के समय वह आचार्य रूप में हमसे मिले। आचार्य विराग सागर जी उलझे हुए संत नहीं होकर सुलझे हुए संत रहे।
यह उद्बोधन विनयांजलि पंचम पट्टाघीश वात्सल्य वारिघी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने बांसवाड़ा बाहुबली कॉलोनी में धर्म सभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने आगे बताया कि जिनवाणी शास्त्र अध्ययन उन्होंने काफी किया और शिष्यों को भी कराया। अनेक साहित्य का सृजन किया आचार्य परमेष्ठी श्रमण संस्कृति के संरक्षक होते हैं वह शिष्यों के साथ समाज को भी लेकर चलते हैं ।भारत देश में कोरोना महामारी के बाद दिगंबर जैन समाज में 9 से 10 आचार्य की क्षति हुई है आचार्य परमेष्ठी श्रमण संघ का निर्माण करते हैं जिस प्रकार परिवार से पिता मुखिया के निधन होने से परिवार दुखी होता है टूट जाता है उसी प्रकार संघ नायक आचार्य परमेष्ठी की समाधि से शिष्यों को भी दुख और पीड़ा होती है समाज में आचार्यों धर्म की प्रभावना करते हैं आचार्य विराग सागर जी जैसे व्यक्तित्व का होना मुश्किल है। आचार्य परमेष्ठी हमारे बीच में रहकर मोक्ष मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं ,प्रेरणा का पुरुषार्थ करते हैं। मोक्ष मार्ग का स्वयं आचरण करते हैं और समाज को भी चलने को प्रेरित करते हैं। कोरोना काल के बाद दिगंबर समाज ने आचार्य विद्यानंद जी आचार्य रयण सागर जी ,आचार्य निजानंद सागर जी, आचार्य विद्यासागर जी सहित अनेक आचार्य की क्षति से श्रमण संस्कृति को आगे बढ़ाने में बाधा हुई है। साधु की समाधि से दुख होता है। दिवंगत आचार्य श्री गुणवान रहे है श्रावको को भक्ति पूर्वक उनके उपदेशों का जीवन में पालन करना चाहिए तभी आचार्य श्री की स्मृति स्थाई । बनेगी सही श्रद्धांजलि होगी। आचार्य विराग सागर जी के समाधि पर हम श्रद्धा सुमन श्रमण संस्कृति को अर्पित करते हैं।
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
