*अन्तर्मना उवाच* (26 जून!) *शब्दों के अर्थ कैसे बदलना है, इसमें सब माहिर है..!*

धर्म

*अन्तर्मना उवाच* (26 जून!) शब्दों के अर्थ कैसे बदलना है, इसमें सब माहिर है..!*

*शब्दों के अर्थ कैसे बदलना है, इसमें सब माहिर है..!*

इसलिए मुंह में जुबान तो सब रखते हैं, मगर कमाल तो वो करते हैं, जो इसको संभाल कर उपयोग करते हैं। तभी तो *रिश्ते गलती से नहीं, हमारी एक गलत फहमी से टूट जाते हैं।* और आज इंसान बातें वहीं क्लियर करता है जहाँ उसे रिश्ता रखना होता है, वरना लोग तो कहते ही हैं – *अच्छा हुआ जान छूटी।*

 

 

 

आज के समय में बहुत जरूरी हो गया है कि सम्बन्धों को बचाने के लिये, हम अपने शब्द कोश पर सोच विचार करें, और छोटे, ओछे, झूठे, तीखे, कटाक्ष, अपमान, द्वेष, ईर्ष्या भरे शब्दों का इस्तेमाल ना करें, सभ्य होने के नाते। क्योंकि –

 

 

*दिल से नाज़ुक नहीं कोई चीज मित्रो..*
*लफ्ज़ का वार भी खंजर की तरह लगता है…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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