ये संसार एक रंग मंच है और हम सभी नाटक के पात्र हैं! स्वस्ति भूषण माताजी

धर्म

ये संसार एक रंग मंच है और हम सभी नाटक के पात्र हैं! स्वस्ति भूषण माताजी
केशवरायपाटन
परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वतिभूषण माताजी ने अपने मंगल प्रवचन ने कहा कि जब दीपक जलाते है हैं तो दीपक की लौ जिस तरफ हवा का प्रवाह होता है उधर जाती है लेकिन जब हवा शांत हो तो दीपक की लौ भी बिल्कुल शांत जलती है और प्रकाशित होती है! ऐसे ही हमारा जीवन है! कर्म कहता है हंसो तो हम हँसते हैं कर्म कहता है रोओ तो हम रोते हैं! कर्म कहता है डर जाओ तो हम डर जाते हैं! कर्म कहता है प्रेम करो तो प्रेम कर्म करता है! कर्म कहता द्वेष तो हम द्वेष करते हैं! जैसे जैसे कर्मों की हवा चलती है वैसे वैसे हमारे विचार बनते जाते हैं! और हमें लगता है कि हम कर रहे हैं! हम कहते हैं मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है! लेकिन ये गुस्सा हमें नहीं आ रहा है गुस्सा दिलाने वाले कर्म हैं! जिधर कर्म रूपी हवा चली हम उधर चले गये! कर्म के वशीभूत हमने अभिमान किया! हमें लगता है कि हम कर रहे हैं!

 

 

माताजी ने कहा की वास्तविकता तो यह है क़ि हम अपना जीवन जी ही नहीं रहे हैं! कर्मों के अधीन जीवन चल रहा है! जैसे फिल्म नाटक आदि में कोई अभिनय करता है वह स्वयं नहीं करता है जैसा डायरेक्टर उसको करने को बोलता है वह वैसा करता है! अभिनय करने वाले को रोना आ रहा हो लेकिन डायरेक्टर ने बोला हँसो तो हंसना पड़ता है! लेकिन जैसे ही वह कैमरे से हटता है तो अपने स्वभाव में आ जाता है! ऐसे ही ये संसार भी एक रंग मंच है और हम सभी नाटक के पात्र हैं!

उन्होंने कहा आज हम सभी संसार के नाटक में रच पच गये हैं! अपने स्वरूप को भूल गये हैं! धर्म हमें सिखाता है जैसे नाटक का पात्र नाटक मानकर नाटक कर रहा है!

 

 

 

 

 

 

 

 

वैसे ही हमें भी अपनी आत्मा को अलग मानकर संसारी नाटक में रोल निभाना है! क्योंकि कर्म अलग हैं आत्मा अलग है!मंदिर रोज क्यों जाते हैं? क्योंकि घर के दर्पण में हम शरीर वाले चेहरे को देखते हो लेकिन मंदिर में जाकर अपनी आत्मा को देखते हैं! इसलिए मंदिर जाते हैं! मंदिर अर्थात मन के अंदर जाना! मंदिर में जाकर भी मन के अंदर नहीं गये तो समझना अभी मंदिर नहीं गये! ये मंदिर हमें मन के अंदर भेजता है! मन के अंदर जाओ देखो निरिक्षण करो क्या सत्य है? क्या असत्य है?क्या संसार है?क्या मोक्ष है?क्या आत्मा है? क्या परमात्मा है?क्या तत्व है? मंदिर में जाकर ये करना पड़ता है! जिसको भगवान में आत्मा और परमात्मा नजर नहीं आये तो वह अभी सिर्फ बाहरी सुंदरता ही देख पा रहा है! भगवान दर्पण के समान है! और हम उस दर्पण में अपना निरीक्षण करते हैं!
चेतन जैन केशव राय पाटन से प्राप्त जानकारी केसाथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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