*अन्तर्मना उवाच* (17 जून!)
*हमें अभी तक ये समझ नहीं आया कि शादी सुदा लोग –*
*जिन्दगी से इतने परेशान रहते हैं..*
*तो फिर सालगिरह इतनी धूम धाम से क्यों मनाते हैं..?*
किसी ने पूछा — *आपको वैराग्य कैसे हुआ-?* हमें समझ में नहीं आता, आपने घर परिवार देखा नहीं, शादी विवाह किया नहीं, तो *क्या समझ कर आपने संसार छोड़ दिया-? आखिर संसार में आपने क्या बुराई देखी-?* हमने कहा — तुम्हारे जैसे फंसे हुऐ लोगों के मुख को देखकर ही मैंने संसार छोड़ा है। *मुझे संसार में उलझा हुआ एक भी आदमी हँसता मुस्कुराता हुआ नहीं दिखा,* सब रोते हुए दिखे, सबके अपने अपने रोग, अपनी अपनी बीमारियाँ, अपनी अपनी परेशानियाँ, अपने अपने जख्म है।
*तुम्हारे उदास, निराश चिंतित चेहरों को देखकर मुझे लगा संसार में दु:ख ही दु:ख है।* इसलिए मैंने संसार को दूर से ही अलविदा कह दिया। उसे छोड़ दिया और *मैं तुमसे भी कहूंगा* —
*संसार यानि दु:ख, परेशानियाँ, थकान, उलझन..*
*इसमें रहो मगर इसमें आसक्त मत रहो…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद
