*अन्तर्मना उवाच* (28 मई!) अब रंग और गंध से पौष्टिकता का कोई सम्बन्ध नहीं है। अंतरमना प्रसन्नसागर महाराज
*आज के आदमी की मानसिकता,*
*कुछ इस तरह बन गई है कि*
*भोजन का रंग और उसकी गंध अच्छी होनी चाहिये..*
*बाकी दुनिया जाये………!*
अब रंग और गंध से पौष्टिकता का कोई सम्बन्ध नहीं है। रंग और गंध ऊपर से भी डाली जा सकती है। बस भोजन रंगीन दिखना चाहिए। उससे सुगन्ध आनी चाहिये। बस भोजन में मजा आ गया। *आज के आदमी को विज्ञापन के बल पर कुछ भी खिलाया–पिलाया जा सकता है।* जानवर वही खाता है, जो उसकी प्रकृति है।




गाय जो घास खाती है, वो वही खायेगी। बकरी पत्ते और ऊट बबूल के काँटे खाता है, तो वो जीवन भर वही खायेंगे। उनका भोजन नहीं मिले तो भूखे सो जायेंगे परन्तु गलत चीज नहीं खायेंगे। लेकिन *आदमी इतना ना-समझ, नादान और मूर्ख है। अपने पेट के लिये कुछ भी खाने को, पीने को कभी भी तैयार हो जाता है।* फिर वो गुण और अवगुण को नहीं देखता है।
*आज आदमी अण्डा, मांस, मछली, मीट, शराब सब कुछ पी-खा रहा है।* टी.वी पर इन सब चीजों का खुल्लम-खुल्ला विज्ञापन दिखता है, अखबार में पढ़ता है और खाना शुरू कर देता है। मनुष्य प्रकृति से शाकाहारी है, मांसाहार मनुष्य की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। *मांसाहार का विकल्प, शाकाहार तो हो सकता है। लेकिन शाकाहार का विकल्प मांसाहार कभी नहीं हो सकता है।*
माँस को छोड़ने वाला, शाकाहार के बल पर पुरा जीवन जी सकता है। लेकिन शाकाहार को छोड़ देने वाला अकेले मांसाहार पर कभी नहीं जी सकता है…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त आलेख संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
