जो त्याग करना जानता है उसका जीवन नदी के समान मीठा होता है, प्रमाण सागर महाराज

धर्म

जो त्याग करना जानता है उसका जीवन नदी के समान मीठा होता है, प्रमाण सागर महाराज
ऐरन
उद्देश्य विहीन मनुष्य का जीवन कुत्ते की भांति त्रिआयामी है” दिन रात इधर उधर मुंह मारना खाना और घूमना और बचे हुऐ समय को अपने साथियों से लड़ झगड़ कर बिता देना यही उसके जीवन का मूल उद्देश्य रहता है।यह कहानी उस कुत्ते की ही कहानी नहीं, उन सभी के जीवन की कहानी है,जो उद्देश्य विहीन इस जीवन को जी रहे है।

 

 

 

उपरोक्त उदगार संत शिरोमणि आचार्य गुरूदेव विद्यासागरजी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने विदिशा की ओर मंगल विहार करते हुये व्यक्त किये। प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया मुनिसंघ का मंगल विहार इस भारी तपन के बीच में चल रहा है,नौ तपा प्रारंभ हो चुके है पारा 45-46 के साथ भीषण गर्मी का प्रकोप चल रहा है। मौसम की स्थिति को देखते हुये प्रतिदिन प्रातःकाल ही मंगल विहार चल रहा है।

27 मई सोमवार मुनिसंघ का मंगल प्रवास ग्राम ऐरन में रहा प्रवास के दौरान प्रतिदिन प्रातःकाल8-15 से सुविधानुसार मंगल प्रवचन तथा सांयकाल 6-15 से शंका समाधान का लाईव प्रसारण चल रहा है। मुनि श्री ने जीवन के मूल भूत लक्ष्य की ओर इशारा करते हुये कहा कि “यह बात सही है कि धन संपत्ति के बिना आपका जीवन नहीं चल सकता लेकिन उस धन संपत्ति को कमाने के लिये यदि आपने अपने मन की शांति को खंडित कर लिया तो ऐसा जीवन और ऐसा धन किस काम का? उन्होंने कहा कि “धन संपत्ति जीवन के साधन है साध्य नहीं” जो लोग अपने जीवन को धन संपत्ति के साथ जीने में लगा देते है उनके लिये पेसा ही परमेश्वर होकर पैसा हावी हो जाता है और वह पैसा कमाने में इतना अधिक पागल हो जाता है कि अपनी पत्नी बच्चों को भी भूल जाता है, ऐसा व्यक्ती जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकता, वह जीवन भर दुःखी होकर रोता ही रहता है।

 

 

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि आगे बड़ो लेकिन धैर्य और सोच समझकर और संतुष्ठी और परिवार के साथ अपनी ग्रोथ को पूरा कीजिये। धन कमाइये धन के पीछे अपने बाहर और भीतर की पवित्रता को खंडित मत होने दीजिये।

 

 

मुनि श्री ने उदाहरण देते हुये कहा कि धन की देवी लक्ष्मी मानी गयी है और लक्ष्मी का वाहन उल्लु है जिसको दिन के उजाले में भी कुछ नहीं दिखता है आखिर वो कौन है? यह आप विचार करो? उन्होंने कहा कि संग्रह करके किसी ने आजतक सुख को प्राप्त नहीं किया जिसने भी त्याग किया उसके जीवन में सुख और वैभव ने प्रवेश किया उन्होंने कहा कि समुद्र और नदी का जीवन देख लो एक के जीवन में मीठापन है तो दूसरे के जीवन में खारापन है। जिसके जीवन में सभी कुछ समेटने की वृति है वह समुद्र के समान खारा है। और जो त्याग करना जानता है उसका जीवन नदी के समान मीठा होता है,

मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य जन्म पाकर भी यदि शिकायते करते हुये अपने जीवन को जी रहे हो तो उसका जीवन निराशा के मलबे में दबकर समाप्त होंने वाला है, यह कहानी किसी एक की नहीं बल्कि उन सभी की है जो उद्देश्य विहीन जीवन को जी रहे है। उन्होंने कहा कि एक लंबे अंतराल के पश्चात हमारा आना हो रहा है।और कही परिवर्तन हुये है जो बच्चे छोटे थे वह अब बड़े हो गये है,और जो कल तक युवा थे वह अब बुजुर्ग हो चुके है। उन्होंने चार बातों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुये कहा कि भारतीय संस्कृति में उसी जीवन को जीवन कहा गया है जिसमें शांति हो, तुष्टी हो, पवित्रता हो, तथा आनंद हो, उन्होंने कहा कि जो धन संपत्ति आपके पास पहले थी उस धन संपत्ति को आपने कही गुना खूब बड़ा लिया है ,लेकिन शांति स्थापित नहीं हो पाई। उन्होंने जीवन का अनुभव बताते हुये कहा कि शांति संपत्ति में नहीं, संतुष्ठी में है। शांति भाग दौड़ में नहीं, साधना में है, फिर भी हम साधन की और भाग रहे है भोग विलास और पदार्थो को इकट्ठा करने में लगे हुये है? उन्होंने कहा कि पैसा कमाओ में पैसा कमाने के लिये मना नही कर रहा लेकिन कब तक? जब तक मन की शांति खंडित न हो तब तक! यदि पैसा कमाने के लिये आपकी नींद उड़ गयी, आपके अंदर चिड़चिड़ापन आ रहा है तो अपने आपको संभालिए,अपने जीने की दिशा बदलिये।

 

उन्होंने गुरुदेव के हायकू को बताते हुये कहा कि “मुकद्दर है उतनी ही चद्दर पैर फैलाओ” अधिक धन कमाने की हवस से जो आपके पास है उसको भी आप खो देते हो।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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