निस्वार्थ प्रेम निश्चल हंसी के लिए बहुत कुछ सहन करना पड़ता है अंतर मना प्रसन्न सागर महाराज
कुंजवान उदगांव
तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज की समाधि एवं तपोस्थली मैं तपस्वी साधक अंतरमना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज का वर्षा योग चल रहा है।
पूज्य आचार्य श्री ने अपनी वाणी से निस्वार्थ प्रेम एवं निश्चल हंसी के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसके लिए बहुत कुछ सहन करना पड़ता है। यह कार्य बहुत कठिन जरूर है लेकिन असंभव नहीं है।
पूज्य आचार्य श्री की सटीक वाणी के द्वारा आचार्य श्री ने इस पर विशेष प्रकाश डालते हुए समझाया कि जहां निस्वार्थ प्रेम होता है वहाँ पराये भी अपने से लगते हैं। और जहां स्वार्थ दिखेगा वहाँ अपने भी बेगाने प्रतीत होते हैं। आज के वर्तमान परिपेक्ष के विषय में महाराज श्री ने कहा अब निश्छल हँसी कहाँ देखने को मिलती है, जो पहले मिलती थी।
उन्होंने आज के आदमी के विषय में कहा कि आज का आदमी समझदार तो कम चतुर चालाक होशियार ज्यादा हो गया है। इसी का ही कारण है कि हर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की बुराई करता हुआ उसकी पीठ पीछे करता दिखाई देता है। कटाक्ष करते हुए कहा कि आज के आदमी मुख्य मीठे एवं वन के जूते लोगों का कांटा लगा हुआ है।
महाराज श्री ने एक प्रश्न करते हुए कहा कि यदि मैं आपसे कहूं कि आप हमें खासम खास 5 लोगों के नाम बता दें जो आपकी पीठ पीछे प्रशंसा करते हो? बाबूजी आपके अपने ही नहीं मिलेंगे। महाराज श्री ने पुनः प्रश्न किया कि पांच ऐसे लोगों के नाम दें जो आपके बिना जीना नहीं चाहते हो? महाराज श्री ने इसके विषय में कहा कि गैरों की हम क्या बात करें – आपके अपने ही नहीं मिलेगे।
वर्तमान की प्रासंगिकता पर मुनि श्री में करारी चोट करते हुए आज के रिश्ते के विषय में कहा कि आज के हर रिश्तो में स्वार्थ लोभ और लालच घुसा हुआ है। ऐसा लगने लगा है कि आज रिश्ते बहुत से बन गए हो। यही कारण है कि आज के रिश्ते सिर्फ नाम के बचे हुए हैं।
आज के वर्तमान वातावरण के विषय में महाराज श्री ने कहा कि हम मुनि को स्मृति में रखते हैं जिनसे केवल हमारे स्वार्थ पूर्ण हो रहे हो वरन अब किसी के पास समय नहीं है। महाराज श्री ने पहले मेहमान आने और आज मेहमान आने के विषय पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि पहले के समय में जब घरों में मेहमान आते थे, तो पूरे घर का माहौल होली दीवाली सा हो जाता था और आज कोई मेहमान आ जाये तो सबसे पहले पूछते हैं आप कब जायेंगे। ये फर्क पड़ा है तब और अब में।आज की वर्तमान परिस्थिति ने सबको स्वार्थ और विचारों की संकीर्णताओं ने जकड़ के रखा है। यही कारण है कि आज हम किसी के काम नहीं आ पा रहे हैं। सिर्फ कमाना, खाना, जोड़ना और सब कुछ छोड़कर यू हीं चले जाना ही ज़िन्दगी और जीने का उद्देश्य बन गया है.।
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
