सिद्धालय रूपी वास्तविक घर में चिर स्थायी शास्वत सुख मिलता है
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
बांसवाड़ा। 
पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी बाहुबली कालोनी श्री सुमति नाथ जिनालय परिसर में संघ सहित विराजित हैं । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म देशना में धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ की विवेचना कर बताया कि संसार में सभी आवागमन करते हैं, भगवान ने भी संसारी प्राणी बनकर जन्म मरण को प्राप्त किया धर्म पुरुषार्थ से यात्रा प्रारंभ कर अर्थ और काम पुरुषार्थ भी किया। संसारी प्राणी केवल अर्थ और काम पुरुषार्थ में तल्लीन है, धर्म को भूल गया है।


धर्म जिनालय में मिलता है जिनालय में भगवान के दर्शन, अभिषेक, अर्चना,आराधना, जाप करें और भगवान की पूजा बगैर इच्छा के करें ।आचार्य ने भक्ति का मार्ग बताया है संसार रूपी महावन, महासागर में संसारी प्राणी भटक रहा है उसे कोई दूसरा किनारा छोर दिखाई नहीं देता है इस कारण संसारी प्राणी दुखी रहता है। यह प्रवचन धर्म देशना पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने बांसवाड़ा की धर्म सभा में प्रकट की। बाहुबली कालोनी प्रवक्ता महेंद्र ,ब्रह्मचारी गज्जू भैया अनुसार आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि भगवान भी हमारे जैसे संसारी प्राणी थे, उन्होंने धर्म पुरुषार्थ कर मोक्ष पुरुषार्थ को प्राप्त किया। उसके लिए संसार समुद्र से पार होने के लिए प्रथम गुण स्थान से 14वें गुणस्थान तक पहुंच कर संसार के आवागमन से मुक्त हुए ।संसार महासागर, महावन है, संसारी प्राणी चौराहे पर खड़े होकर चार रास्तों में से अपने घर को जाकर शांति का अनुभव करते हैं किंतु यह घर वास्तविक घर नहीं है क्योंकि वास्तविक घर सिद्धालय है जहां पर चिरस्थाई शाश्वत सुख मिलता है। आचार्य श्री ने द्वितीय पट्टाधीश आचार्य शिवसागर जी के प्रवचन का उल्लेख कर बताया कि वह श्रावकों को घर से खड़े-खड़े निकलने को प्रेरित करते थे आड़े होकर निकलने के लिए मना करते थे आड़े होकर निकलने से आशय जब किसी की मृत्यु होती है तो उसकी शवयात्रा आड़ी होकर निकालते हैं और खड़े-खड़े व्यक्ति की शोभायात्रा दीक्षा के पूर्व निकलती है जो खड़े-खड़े भव्य आत्मा निकलती है वह सिद्ध अवस्था को प्राप्त करने के लिए अग्रसर होती है ।धर्म जिनालय से प्राप्त होता है। जिनालय में भौतिक उपकरण मोबाइल को नहीं लेकर जाना चाहिए क्योंकि मोबाइल की बजने वाली घंटी से आर्त और रौद्र ध्यान स्वयं को भी होता है और मंदिर में अन्य श्रावकों को भी होता है।
भगवान ने कर्मो का आश्रव रोक कर कर्मो की निर्जरा की
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजममंडी 9929747312
