अन्तर्मना उवाच*खुद को ही चुनना पड़ता है जीवन का मार्ग..*
*अन्यथः पता नहीं चलता कि जरूरी क्या है-?*
*खुद को ही चुनना पड़ता है जीवन का मार्ग..*
*अन्यथः पता नहीं चलता कि जरूरी क्या है-?*
*मेरे सन्यास काल को 36 वर्ष हो रहे हैं* – हमने जाना और अनुभव किया कि *दीक्षा सिर्फ वेश परिवर्तन का नाम नहीं, अपितु भाव परिवर्तन का पुरूषार्थ, आत्म ज्योति की ललक, और दीक्षित होने के परिणामों का सदैव सुमिरन ही सर्वोत्तम पल है दीक्षा।* दीक्षार्थी साधकों की सम्यक भावनाओं का उपादान और दीक्षा गुरू का अनुग्रह, जब दोनों का संयोग बनता है तब दीक्षा फलवती होती है।
शिष्य की सुषुप्त चेतना को जगाने में निमित्त कारण गुरू बनते हैं*। दीक्षा के समय दीक्षार्थी को उस समय यह एहसास नहीं होता कि मुझे क्या मिल रहा है, परन्तु जब दीक्षित साधक रत्नत्रय की साधना में सामायिक, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण में रमता है,, वीतरागी अरिहंत परमात्मा के स्वरूप में अपने-आप को डूबोता है,, अपने आत्म स्वरूप के चिन्तन मनन में स्वयं को लखता है,, तब दीक्षा पनपती है, समृद्ध होती है और महसूस करती है *देह से विदेह की साधना में स्वयं को।*





संसार-परिवार की मोह माया को छोड़कर, अपना सर्वस्व जीवन वीतराग मार्ग को समर्पित कर, आत्म स्वरूप के चिन्तन में, रत्नत्रय की आराधना में, अपने अज्ञान के तिमिर को दूर कर,, मन, वाणी और काया को वश में कर, अशुभ कार्यों से मुक्त होने लगती है और वीतराग प्रभु की शरण में स्थान मिल जाता है। सिर मुण्डन-कैशलोन्च के साथ मन का मुण्डन भी होता है, इन्द्रियों की चंचलता का निग्रह हो जाता है, वस्त्रों के त्याग के साथ मन के विकारों का भी त्याग हो जाता है, बाहर की ग्रंथियों को खोलने के साथ मन की सभी ग्रंथियों का विमोचन हो जाता है और फिर भीतर घटती है विनम्रता, हित मित प्रिय वचनों की मधुरता, चर्या से आचरण की पावनता, सभी के प्रति वात्सल्य पूर्ण प्रेम की निश्चलता, जिससे अन्तःकरण में हो सके आध्यात्मिक शुचिता की पावनता।
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दीक्षा – चेतना की विकास यात्रा और उसके ऊर्ध्वगमन के निमित्त तपश्चरण के प्रयोगों का सम्वर्धन, सत्यनिष्ठ प्रेम की साधना, करूणा की आराधना, सम्वेदनाओं की अनुवर्तना की प्रतिबद्घता का नाम ही दीक्षा है…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
