प्रमाण सागर महाराज ने धर्म की प्रमाणिकता को जन-जन तक सरलता से पहुंचाया पूज्य मुनि श्री के दीक्षा दिवस पर भाव भरी अभिव्यक्ति
बहुत कम व्यक्तित्व होते हैं जो जन्म नाम को और दीक्षा लेने के बाद के नाम की सार्थकता को सिद्ध करते हैं। ऐसे हैं श्रमण संस्कृति की ध्वजा को पुलकित करने वाले पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज। जिनका आज हम दीक्षा दिवस मना रहे हैं। पूज्य मुनि श्री का दीक्षा से पूर्व नाम नवीन जैन रहा उन्होंने हर कार्य को नवीनता के साथ किया है और प्रेरणा दी है। ।
महाराज श्री ने धर्म की अलख जगाने का कार्य किया है। उन्होंने एक ऐसे तीर्थ का निर्माण किया है जो युगों युगों तक जिन धर्म की अनुपम निधि के रूप में जाना जाएगा हम बात कर रहे हैं शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर तीर्थ की तलहटी पर स्थित गुणायतन की जो अपने आप में एक अलौकिक है। जब यह बनकर निर्मित होगा तो संपूर्ण विश्व इसे देख गदगद महसूस करेगा।

पूज्य महाराज श्री ने अपने उद्बोधन से युवा पीढ़ी को धर्म से जोड़ा है। उन्होंने धर्म के माध्यम से जटिल शंकाओं का समाधान शंका समाधान के माध्यम से करके सरलता से किया है और सरलता से कर रहे हैं। निश्चित रूप से श्रमण संस्कृति की यह एक निधि है। निश्चित रूप से आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की चेतन कृति है। जो अचेतन को भी चेतन कर रही है।






यथा नाम तथा गुणः’ की उक्ति का जीवन्त रूप दिखाने वाले, बहुमुखी प्रतिभा के धनी मुनिश्री 108 प्रमाणसागर जी महाराज युगसाधक सन्तशिरोमणि दिगम्बर जैनाचार्य श्री108 विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य हैं। उनका गहन-गम्भीर ज्ञान, निर्दोष-निस्पृह चर्या और सहज-सरल वृत्ति सहज ही सभी को अपनी ओर खींच लेते हैं। धर्म और दर्शन जैसे गूढ़ विषयों की सरल और सरस प्रस्तुति उनका अनुपम वैशिष्टय है। उन्होंने धर्म को पारम्परिक जटिलताओं से मुक्त करते हुए जीवन-व्यवहारोपयोगी रूप में प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि एक बार उनके सम्पर्क में आने वाला व्यक्ति, उनसे अभिभूत होकर उनका ही हो जाता है। मुनिश्री की वाणी में ओज, लालित्य और सहज आकर्षण है। वे अपनी बात को बड़ी सहजता और सरलता से श्रोताओं के हृदय में उतार देने में सिद्धहस्त हैं, यही कारण है कि उनके प्रवचनों में हजारों-हजार श्रोताओं के मध्य भी सूचीपात नीरवता रहती है।
सल्लेखना संथारा को आत्महत्या घोषित किए जाने के विरुद्ध आंदोलन में मुनि श्री की अहम भूमिका रही
जब माननीय राजस्थान उच्चन्यायालय द्वारा जैन साधना के प्रधान अंग सल्लेखना/संथारा को आत्महत्या निरूपित करते हुए दिए गए स्थगन-आदेश के बाद मुनिश्री ने ‘धर्म बचाओ आन्दोलन’ का सूत्रपात करके जैन संस्कृति पर बहुत बड़ा उपकार किया है। मुनिश्री के आह्वान पर 24अगस्त 2015 को सम्पूर्ण भारतवर्ष के साथ-साथ विदेशों में भी एक समय में एक परिधान में एक करोड़ से अधिक लोगों ने मौनप्रदर्शन किया। मुनिश्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि सल्लेखना आत्महत्या नहीं है, यह तो मृत्यु के अवश्यंभावी हो जाने की स्थिति में जैन साधना पद्धति के अन्तर्गत साधक द्वारा अपनी साधना के बल पर मृत्यु के भय और कष्ट से ऊपर उठते हुए; साक्षीभाव से उसके अभिनन्दन की अनूठी परम्परा एवं दुर्लभ कला है। ‘धर्म बचाओ आन्दोलन’ के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के पश्चात् माननीय उच्चतम न्यायालय ने सल्लेखना पर दिए गए स्थगन-आदेश पर अन्तरिम रोक लगा दी।
ऐसे महान संत के दर्शन कर जन-जन धन्य हो जाता है जिन्हें भी इनकी आशीष प्राप्त होती है वह सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
