अन्तर्मना उवाच

धर्म

अन्तर्मना उवाच

*समाज एक ऐसा बाजार है,*
*जहाँ सलाह थोक में और सहयोग,*
*ब्याज पर मिलता है..!*

*आज देश का घर, परिवार, समाज, नाज़ुक दौर से गुजर रहा है।* सबकी स्थिति नाज़ुक है। समय रहते स्थिति को संभालना होगा वरना परिणाम भयंकर होगा। *

 

 

आज आदमी सम्वेदन हीन होता जा रहा है।* हिंसा, हत्या, लूट-खसोट, डकैती, भ्रष्टाचार के समाचार पत्र रोजमर्रा की।

 

 

आवश्यकता बनते जा रहे हैं। जिस दिन अखबार में या टी.वी में, इस तरह की कोई खबर नहीं होती तो हम कहते हैं कि आज कोई खास समाचार ही नहीं है।

*मनुष्य के हृदय में, बहने वाले करूणा के श्रोत सूखते जा रहे हैं।* समाज और देश के लिये ये शुभ सन्देश नहीं है।

*कैसे रहेगी जिन्दा तहज़ीब,*
*जरा सोचिए!*
*पाठशाला बन्द है, और*
*मधुशाला खुली है…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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