समय सागर महाराज एक दिन ऐसा ऊंचा उठेगे की संपूर्ण आकाश भी उनमें समा नही पाएगा आगम सागर महाराज
कुंडलपुर
मुनि श्री आगम सागर महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर जी महाराज से जुड़ा संस्मरण बताया
आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज से दीक्षित से आगम विज्ञ पूज्य मुनि श्री आगम सागर महाराज ने आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज एवं आचार्य श्री 108 समय सागर महाराज से जुड़ा एक संस्मरण सुनाया।
पूज्य मुनि श्री आगम सागर जी महाराज संस्मरण को बताते हुए कहते हैं कि जब विद्याधर मुनि विद्यासागर महाराज हो गए, और अष्टगे परिवार हर साल चौका लगाने सदलगा जाता था तो एक डेढ़ माह करीब राजस्थान में ही संघ के पास रुकते थे। तब जब विद्यासागर महाराज प्रवचन करते थे,तब शांतिनाथ (समयसागर महाराज) मोहल्ले के बच्चों के साथ गेम खेला करते थे। व अनंतनाथ लड़कों के साथ साइकिल चलाया करते थे। जब घर जाने का वक्त आता तो बस इतना कहते घर जा रहे हैं। धीरे-धीरे जब एक दो बार घर आना जाना हुआ। किंतु जब थोड़े बड़े हुए कुछ समझ आई तो पता चला कि दोनों बड़ी बहन शांत बेन, सुवर्णा बेन ने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। इनके साथ माता-पिता भी यही रह रहे हैं। तब दोनों छोटे भाई आचार्य श्री से बोले आचार्य श्री नमोस्तु घर जा रहे हैं।




तब गुरुजी दोनों को गौर से देखकर पूछते हैं कहां जा रहे हो?प्रति उत्तर में दोनों बोले घर जा रहे हैं। आचार्य श्री बोले क्या है घर में? दोनों बोले खेती-बाड़ी आचार्य श्री तब आचार्य श्री ने कहा वही खेती बाड़ी, जो मैं छोड़ आया, कब तक उलझोगे अनंत काल बीत गए, इस खेती-बाड़ी में अनंत काल हो गया खाते-खाते पर अभी तक पेट नहीं भरा आचार्यश्री अपने भाइयों को नहीं दो भव्य प्राणियों को बता रहे थे।
दोनों देखते रह गए कहने को कुछ शब्द नहीं, दोनों का घर जाने का रिजर्वेशन हो गया था पर जब सुना तो दोनों सुन्न हो गए। फिर मल्लप्पा जी ने आचार्य श्री पूछा आप तो बड़े थे, ज्ञान था, वैराग्य था, पर इनको तो कुछ नहीं है, कैसे आगे बढ़ेंगे तो आचार्य श्री बोले रुक गए है, यही इनके अंदर वैराग्य है। क्योंकि चलने वाले व्यक्ति, उछल कूद करने वाले व्यक्ति के अंदर वैराग्य नहीं है, लेकिन जो एक जगह स्थिर हो गया है, उसके अंदर वैराग्य ठहर गया है।
रही बात ज्ञान नहीं होने की तो गुरु महाराज कहते हैं कि, जिसकी स्लेट में कुछ लिखा गया हो उसको पहले हमें मिटाना पड़ता है, ज्ञान, भ्रम, क्रिया बिन उस आदमी के पास ज्ञान भार है जो पढ़ा लिखा होकर भी ज्ञान को आचरण भी नहीं लाता, चर्या नही करता। मुझे तो ऐसे आदमी चाहिए जिनकी स्लेट खाली हो। क्योंकि गुरु महाराज अपने शिष्य को जो बात डालते जाते हैं वह शिष्य भी उस अनुसार चलता जाता है, तो गुरु का भी कल्याण होता, वह शिष्य का भी, जब शिष्य गुरु से ज्यादा ज्ञानी हो जाए तो भी कहता रहे मुझे कुछ नहीं आता। कुछ भी नहीं,कुछ भी नहीं।
आगम सागर महाराज कहते हैं हमने देखा है समय सिंधु गुरुदेव के पास बैठकर आंखें नीचे किए रहते हैं। वह ऐसे ज्ञान को पीते हैं जैसे कुछ नहीं आता हो, उन्हें क्या नहीं आता यह ग्रहस्थ नहीं समझ सकते, आज तक समय सागर महाराज की नजरे कभी ऊंची नहीं हुई वह स्वभाव से झुके हैं, और एक दिन ऐसा ऊंचा उठेगे की संपूर्ण आकाश भी उनमें समा नही पाएगा और देश काल की सीमा को लांगकर समय सागर के असीम आकाश में अनंत काल तक स्थिर हो जाएंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
