संत समागम से जीवन में धर्म धारण कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ करें। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

संत समागम से जीवन में धर्म धारण कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का पुरुषार्थ करें। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

पारसोला

वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सन्मति भवन पारसोला में विराजित है। आज की धर्म सभा में आचार्य श्री ने बताया कि समाज के बार-बार निवेदन गुरु भक्ति से संघ का वर्षायोग घोषित हो गया है ।संघ का लाभ समय के उपयोग से मिलेगा ,समाज को धर्म का लाभ प्राप्त कर धर्ममय जीवन बनाना होगा आप गृहस्थी के कार्यों से जीवन में उलझे हुए हैं, साधुओं संतों ने धर्म को धारण कर जीवन को धर्ममय बनाने में लगे हैं उन भव्य जीवो से आपको धर्म धारण करने का लाभ मिल सकता है ,क्योंकि मनुष्य जीवन दुर्लभता से प्राप्त होता है अनमोल रत्न है ,कर्मों से आत्मा की सुरक्षा करना होगा इसलिए संत समागम में उपदेश सुनने के लिए समय का ध्यान रखना जरूरी है धर्म प्राप्त करने से आत्मा का कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है यह मंगल उपदेश पारसोला में विराजित पंचम पट्टाधीश वात्सल्यवारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्म सभा में प्रकट की। ब्रह्मचारी गज्जू भैया ,राजेश पंचोलिया पारस पाटनी अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि आप लौकिक जीवन में प्रिय वस्तु प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करते हैं लालायित रहते हैं उसके लिए समय का सदुपयोग करते हैं मनुष्य जीवन अनमोल है इसलिए इस बात को समझना जरूरी है कि धर्म से पुण्य का लाभ अर्जित होता है और चार गतियां में मनुष्य गति ऐसी है जहां पर धर्म से , तप , संयम ,दान से पुण्य का अर्जन किया जाता है देव गति में सुख है तिर्यच और नरक गति में दुख ही दुख है पशु तिर्यंच गति में भी किसी जीव का तीव्र पुण्य होता है तो वह मुनिराज के उपदेश को जीवन में धारण कर हाथी की पर्याय हो ,या सिंह की पर्याय हो मुनिराज के उपदेश को श्रद्धा पूर्वक ग्रहण कर श्री पारसनाथ और श्री महावीर स्वामी बने हैं इसलिए जो मनुष्य जीवन जो कि पिछले जन्मों के पुण्य से मिला है आपको धर्म धारण कर जीवन को सुधारने का प्रयास करना चाहिए मरीचि के जीव का उदाहरण सामने है जिन्होंने धर्म की विपरीत कार्य कर धर्म के विरुद्ध मत मतांतर चलाएं किंतु जब उन्होंने धर्म को समझा धारण किया तो वह श्री महावीर स्वामी की पर्याय में आए दुख और कष्ट का स्मरण करने से हमें सुख का मार्ग मिलता है । मनुष्य जीवन में शक्ति और सामर्थ्य से जीवन में धर्म धारण कर सुख प्राप्त कर सकते हैं जगत कल्याण की भावना से तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध कर तीर्थंकर बनते हैं इसलिए संत समागम में मुनिराज के उपदेशों को समय पर ग्रहण करें मनुष्य जीवन अनमोल रत्न है धर्म देव शास्त्र गुरुओं जिनालय से मिलेगा ।उपदेश को सुनकर समझें ,चिंतन कर जीवन का उत्थान करने का प्रयास करें ।गुरु के सानिध्य को प्राप्त कर जीवन में ऐसा कार्य करें जिससे आपको वास्तविक सुख और लाभ मिल सके मनुष्य जीवन में गलती और कमियों को दूर कर जीवन को धार्मिक बनाकर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का प्रयास पुरुषार्थ करें ।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जेन लुहाड़िया रामगंजमंडी9929747312

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