अन्तर्मना उवाच* (17 मार्च)

धर्म

*अन्तर्मना उवाच* (17 मार्च)

*किसी और के जैसा होने की चाह ही हमें..*
*रोज दु:ख दे रही है और व्यर्थ परेशान कर रही है..!*

*भगवान महावीर कहते हैं* – सत्य केवल एक ही है और वह यह है कि मैं स्वयं के अलावा इस जगत में और कुछ भी नहीं पा सकता हूँ। *अधर्म का अर्थ है* – स्वयं को छोड़कर और सब कुछ पाने का प्रयास करना ही अधर्म है।

 

 

 

*महावीर भगवान कहते हैं* – धर्म मंगल है, पर कौन सा धर्म–? यह अहिंसा, संयम और तप वाला धर्म ही मंगल है। *जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, मंगल है, सुख है, शान्ति और आनंद है,, वह धर्म का ही फल है। 

 

जीवन में जो भी दुःख, परेशानी है,, वह अधर्म का फल है।* धर्म स्वभाव है, और स्वभाव तक पहुंचने के लिये धर्म के विविध प्रकार हैं। *धर्म का आत्यंतिक रूप है स्वभाव में जीना।* और आज हम स्वभाव से भटक गये हैं, वरना व्यक्ति कभी नहीं पूछता कि आप स्वस्थ और प्रसन्न हैं-?? स्वस्थ व्यक्ति कभी नहीं पूछता कि मैं स्वस्थ हूं या नहीं-? यदि स्वस्थ व्यक्ति पूछता है कि मैं स्वस्थ हूं या नहीं, तो वह व्यक्ति बीमार हो चुका है।

 

धर्म का मर्म यही है कि माता पिता की सेवा करना, गुरू जनों के संघ का ध्यान रखना, और परमात्मा की नजरों से गुजरना, किसी को दुःख नहीं देना, सबके प्रति मैत्रीपूर्ण व्यवहार रखना। *अहिंसा शब्द में ही इतना गहरा अर्थ छुपा है कि धर्म का मर्म एक बार में ही समझ आ जाये…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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