शबरी की तरह निस्वार्थ भक्ति करना सीखें सौम्यमति माताजी
पिपरई
— भगवान की भक्ति से बड़े बड़े काम भी आसानी से हो जातें हैं।
भक्ति में वह शक्ति है जो किसी भी कार्य को सफल बना सकते हैं भक्ति शबरी की तरह करना चाहिए शबरी की भक्ति निस्वार्थ थी इस कारण श्री रामचन्द्र जी अपने विकल्पों को भूलकर माता शबरी के हाथ दिये जा रहें बेरोर को ऐसे खा रहे थे, जैसे षटरस भोजन का आनंद ले रहे हो।यह उद्गार विमान महोत्सव को संबोधित करते हुए आर्यिका श्री सोम्यमति माताजी ने व्यक्त किए
रजत विमान में निकलें भगवान जिनेन्द्र देव
मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की परम शिष्या आर्यिका श्री सोम्यमति माताजी ससंघ के सान्निध्य में जिला मुख्यालय से तीस किलोमीटर दूर पिपरई आर्यिका संघ के सान्निध्य में श्री सिद्धचक्र महा मंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ के समापन पर
भगवान जिनेन्द्र देव की भव्य विमान यात्रा निकाली गई यह यात्रा मन्दिर जी से प्रारंभ होकर मुख्य मार्गो से होते हुए गोयल जी के बाड़े पर पहुंच कर धर्म सभा में बदल गई।

जहां भगवान की फूलमाल ज्ञानमाल के साथ ही चारित्र माल का आयोजन किया गया। इस भव्य विमान यात्रा में आगे आगे बेंड बाजे उनके पीछे पाठशाला के बच्चे, के बाद में बहनों का दल डांडिया नृत्य करते हुए चल रहा था। उनके वाद युवाओं का दल जय जय करते हुए भगवान जिनेन्द्र देव के विमान जी के आगे आर्यिकारत्न के साथ चल रहा था।
धर्म सभा स्थल पर समारोह को संबोधित करते हुए माताजी ने कहा कि धर्म के काम में सभी का उत्साह सराहनीय है। मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ बताये धर्म अर्थ काम और मोक्ष हम अपने जीवन को इस तरह व्यवस्थित करें कि सभी पुरूषार्थो को समान रूप से करते हुए अपने मनुष्य जीवन को सफल बनाये।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
