अन्तर्मना उवाच

धर्म

अन्तर्मना उवाच


*मनुष्य असली स्वभाव छुपाकर रखता है,*
*और विभाव का प्रदर्शन करता है..*
*इसलिए दु:खी परेशान रहता है..!*

 

 

मनुष्य के पास स्वभाव जैसी कोई चीज नहीं बची है। *मनुष्य जैसा स्वभाव बनाता है, वैसा उसका स्वभाव बन जाता है*। मनुष्य – आज जैसा दिख रहा है वह वैसा है नहीं, यह पुराने संस्कारों का परिणाम है। इसलिए आप एक मनुष्य के हजार रूप देखते हैं क्योंकि वह स्वभाव में नहीं जी रहा है। *मनुष्य* – नौकर के सामने कुछ, दोस्तों के सामने कुछ, मन्दिर में कुछ, मण्डी में कुछ, बच्चों के सामने कुछ, बीवी के सामने कुछ, पड़ोसन के सामने कुछ। *मेरे कहने का मतलब है – मनुष्य में स्वभाव जैसी कोई चीज नहीं और इन्सान जैसी इन्सानियत नहीं।*

 

 

*आपने कभी ध्यान दिया हो* – कुत्ता का एक स्वभाव है, बिल्ली का एक स्वभाव है, गधे का एक स्वभाव है

, शेर का एक स्वभाव है,, लेकिन मनुष्य का–? इसलिए *जानवर पूरा पैदा होता है, आदमी आधा अधूरा पैदा होता है।* मनुष्य जैसा चाहे वैसा बन सकता है, लेकिन उसकी आदत बन गई कि चेहरा मनुष्य का और चरित्र भेड़िया का। *कभी आपने सुना किसी जानवर के लिए कि आदमी की मौत मरेगा-? लेकिन आदमी के लिए आपने अनेक बार सुना होगा – तू कुत्ते की मौत मरेगा।* यह तो जानवरों का सरासर अपमान है।

आपने आदमी के मुख से सुना कि आज बिल्ली रास्ता काट गई – तो मेरा काम खराब हो गया।

 

लेकिन आदमी ने बिल्ली का रास्ता काटा तो बिल्ली बच्चों सहित पूरे दिन भूखी मरी। *स्वभाव का अर्थ है

 

– प्रेम, सदभाव, मैत्री, करूणा और परोपकार। विभाव का अर्थ है – इनसे विपरीत जीवन जीना*। धर्म स्वभाव में जीना सीखाता है और अधर्म विभाव में जीना सीखाता है। *आप किसमें जी रहे हैं और किसमें जीना चाहते हैं…???* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी 

    संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 

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