अन्तर्मना उवाच* (11 मार्च)स्वार्थ का प्रभाव अक्सर जीवन को स्वभाव में ले आता है..!*

धर्म

*अन्तर्मना उवाच* (11 मार्च)स्वार्थ का प्रभाव अक्सर जीवन को स्वभाव में ले आता है..!*

*स्वार्थ का प्रभाव अक्सर जीवन को स्वभाव में ले आता है..!*

स्वार्थ शब्द द्वि अर्थक है – *दुनिया स्वार्थ का मतलब अपना काम निकालना समझती है और धर्म का अर्थ स्वार्थ और स्वार्थ का अर्थ आत्मार्थ।* सही अर्थो में धर्म का अर्थ ही स्वार्थ है। क्योंकि धर्म का अर्थ स्वभाव है। *ध्यान रखना – जिसने स्वार्थ साध लिया, उसने परमार्थ साध लिया।* जिससे स्वार्थ न सधा, उससे परमार्थ कभी नहीं सधेगा।

 

 

🔸 *जो अपना ना हो सका, वह दूसरों का कैसे होगा-?*
🔸 *जो स्वयं को समय नहीं दे सका, वह दूसरों को क्या समय देगा-?* वह सिर्फ दूसरों को बेवकूफ़ बना सकता है, लेकिन समय, सामायिक, ध्यान नहीं सिखा सकता। 
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*जो स्वयं से प्रेम नहीं कर सका, वह अन्य जीवों से क्या प्रेम करेगा-?*। 

जिस दिन तुम स्वयं अपने डाॅक्टर बन जाओगे,

 

 

उस दिन के बाद फिर तुमको डाॅक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। *दूसरों को रोशनी दिखाओ, उससे पहले टार्च का मुँह स्वयं की ओर कर लो*। बस यही है सच्चा स्वार्थ का अर्थ।

*जिस दिन हम सच्चे स्वार्थी बन जायेंगे, उस दिन आप हम सबसे सुखी हो जायेंगे…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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