राग रंग से परे समय सागर महाराज
पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज द्वारा अपने शिष्यों को जो पाठ पढ़ाया वह जीवंत प्रमाण परिरक्षित करता है कहा जाता है कि तप कर सोना बनता है ठीक वैसा ही हमारे दिगंबर संतो में देखने को मिलता है।
पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने अपनी साधना, अध्ययन एवं आचरण के द्वारा जो शिक्षा अपने शिष्यों को दी वह सार्थक परिणाम देती है। पूज्य गुरुदेव ने निश्चित रूप से पंचम युग में चतुर्थ युग की चर्या का अनुपम उदाहरण दिया इसी के साथ-साथ उन्होंने अपने द्वारा दीक्षित शिष्यों को गुरुकुल जैसी शिक्षा दी। एवं उनके द्वारा दीक्षित शिष्य भी वैसे ही उत्कृष्ट साधक है। 
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के बाद अब नए आचार्य पद पर पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समय सागर महाराज सुशोभित होने वाले हैं। वे राग रंग से परे हैं। उन्हें किसी प्रकार का मोह नहीं।


उनकी निर्मोहिता का उदाहरण जब परिरक्षित हुआ जब वह ग्रंथ के माध्यम से स्वाध्याय करने लगे। और जिनवाणी को उन्होंने पंखे के डिब्बे पर रखकर ग्रंथ को विराजमान कर शास्त्र का अध्ययन किया और सभी को कराया। किंचित मात्र लेश नही।
हमारे दिगंबर संतो के विषय में यही कह सकते हैं।
महावीर की त्याग तपस्या तुमसे है जानी,
शास्त्रों के शब्दों की क्षमता तुमसे है जानी।
तुम चरित्र के प्रखर सूर्य हो ज्ञान ज्योति वर दो ।
विद्यासागर वसुंधरा पर मेरे गुरुवर हो।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
