विशुद्ध विज्ञ सुवाच
सज्जन के सामने मन सज्जन बनने को तैयार नहीं,
प्रेम के सामने मन प्रेम देने को तैयार नहीं,
उदार के सामने मन उदार होने को तैयार नहीं,
सरल के सामने सरल बनने को तैयार नहीं,
यही मन की कुटिलता है।
प. पू. प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनीआर्यिका रत्न 105विज्ञमति माताजी
अनमोल सेठी से प्राप्त संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
