पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर महाराज की तपस्या का ही प्रतिफल उन्हे मिला जो आचार्य गुरुवर की अंतिम क्षणों में वह गुरुवर के समीप रहे।

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

पूज्य मुनिश्री चंद्रप्रभ सागर महाराज की तपस्या का ही प्रतिफल उन्हे मिला जो आचार्य गुरुवर की अंतिम क्षणों में वह गुरुवर के समीप रहे।

संतो के संत महा संत महामनाआचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज ब्रह्मलीन हो गए। लेकिन उनकी साधना उनकी निष्प्रहता युगों युगों तक जीवंत रहेगी।

 

 

आचार्य गुरुवर के समीप भला कौन नहीं जाना चाहता। ऐसे कही संत एवं शिष्य जिनको गुरुदेव ने दीक्षा देकर कृतार्थ किया। वह भी चाहते थे कि गुरुदेव के अंतिम क्षणों में आकर उनकी आशीष ले सकें। लेकिन यह हो ना सका।

 

 

इतना अनंत पुण्य प्राप्त हुआ आचार्य श्री के संघ में तपस्वियों की श्रेणी में जिनका नाम सर्वोत्तम श्रेणी में लिखा जाता है ऐसे पूज्य मुनि श्री 108 चंद्रप्रभ सागर महाराज को गुरुदेव की अंतिम समय में उनके समीप रहने का अवसर व उनकी सेवा का अवसर प्राप्त हुआ।

ऐसा उन्हें क्यों प्राप्त हुआ इसके लिए भी उन्होंने उत्कृष्ट तप किया जी हां ऐसा इसलिए एक महान मनीषी जिनकी साधना तप संयम के कारण ज़न जन का कल्याण हुआ है। कलयुग में सदयुग जैसी शिष्य मंडली को बनाया। गुरुकल बनाकर एक आयाम दिया ऐसे महामना मनीषी है आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जो अस्वथ्य होने पर भी अपनी साधना पर अडिग रहे। उनके जीवन के अंतिम क्षणों में उनकी सेवा का अवसर उन्ही के परम शिष्य मुनि श्री चद्रप्रभ साग़र महाराज को मिला इसका कारण एक मात्र यह रहा कहा जबसे मुनि श्री चद्रप्रभ साग़र महाराज ने मुनि दीक्षा ली तबसे आज तक एक आहार एक उपवास की साधना कर रहे है। वह 3 बार सिंहनिष्कंडित व्रत भी कर चुके है। अगर तप त्याग की होड़ हो तो उनके जैसा तप बिरला ही कर पाता है। उनकी साधना तप गुरु चरणों के प्रति समर्पित होने के कारण ही उन्हे गुरु चरणों के समीप रहने का व सेवा का यह अवसर मिला।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी कि रिपोर्ट

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