वैलेंटाइन डे को वात्सल्य डे के रूप में मनाए विज्ञमति माताजी
बाराबंकी
परम पूज्य सिद्धान्त रत्न,भारत गौरव गणिनी शिरोमणी आर्यिका105 विशुद्धमति माताजी की प्रियाग्र शिष्या सिद्धांत वाग्मी ,पट्ट गणिनी आर्यिका 105विज्ञमती माताजी ने अपनी विज्ञ वाणी से सभी को सरोबार करते हुए बताया कि जैन दर्शन में वेलेन्टाइन डे का कहीं भी विधान नहीं हैं।लेकिन आज कल की युवा पीढ़ी यदि इसे मनाना ही चाहती है तो इसे वात्सल्य डे के रूप में मनाए।
उन्होंने इसके विषय पर बोलते हुए कहा कि आज का दिन पाश्चात्य संस्कृति का वैलेंटाइन डे हैं।





लेकिन भारतीय संस्कृति का वात्सल्य अंग हैं।प्रेम एकांगी होता है।लेकिन वात्सल्य सर्वांगी होता है।प्रेम में दो आत्माओं का मिलन होता है।लेकिन दो आत्मा मिलकर एक नही होती है। जैन धर्म सभी प्राणियों के प्रति वात्सल्य भाव रखने के सिद्धान्त को प्रतिपादित करता हैं।

परस्परोपग्रहो जीवनां
परस्परोपग्रहो जीवनां के सूत्र को जो जैन दर्शन ने हमे प्रदान किया है ।वो बहुत ही अमूल्य हैं।इसलिए हम भी परस्पर में वात्सल्य अंग का पालन करे।क्योंकि सम्यग्दर्शन के 8अंगों में इसका महत्वपूर्ण स्थान हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
