*चिंता से बनती चिता :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी*
गुंसी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुंसी में विराजमान गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी ससंघ धर्म की महती प्रभावना कर रही है । दिन – प्रतिदिन भक्तगण क्षेत्र पर पहुंचकर शांति प्रभु की भक्ति कर गुरु माँ का वात्सल्यमयी आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं।
पूज्य माताजी ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि – चिंता और चिता एक समान है, इसमें मात्र एक बिंदु का अंतर आता है। चिंता मानव को मृत होने के बाद जलाती हैं किंतु चिंता मनुष्य को जीवित रहने तक जलाती रहती है। चिंता से बचने के लिए स्वध्याय बहुत अच्छा उपाय है।
स्वध्याय परम तप है अरिहंतों के प्रवचन आत्मा को सिद्व बना देते है। भगवान के वचन, जन्म, जरा, मृत्यु के लिए औषधि की तरह कार्य करते है।

जिनवाणी औषधि का प्रयोग करने वाले को कभी कोई रोग नहीं हो सकते। जिनवाणी सर्वरोग नाशनी है, जिनवाणी रोग को जड़ मूल से नष्ट कर देती है। मोह रोग सबसे बड़ा रोग है मोहनीय कर्म के जाते ही सभी रोग चले जाते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
