*शांति का परम द्वार निर्मल सृष्टि :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी*
गुंसी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुंसी (राज.) में विराजमान श्रमणी गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी ने धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – शांति का परम् द्वार निर्मल दृष्टि है…। और जिसकी दृष्टि निर्मल नहीं, उसका चित्त शांत नहीं होता। दृष्टि जैसी होती है उसे सृष्टि भी वैसी दिखनी शुरू हो जाता है। दृष्टि ही हमारी विचार व सोंच को प्रभावित करती है।
जीवन श्रेष्ठ तभी हो सकता है जब हम विचारों की पवित्रता के साथ आचरण की भी पवित्रता रखेंगे।


चर्चा के साथ सम्यक् चर्चा करेंगे। जीवन में विवेकपूर्ण प्रबल पुरुषार्थ आवश्यक है। पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता है, वर्तमान पुरुषार्थ ही भविष्य का भाग्य बनता है।
पूज्य माताजी की संघस्थ आर्यिका विकक्षाश्री माताजी के ससंघ सान्निध्य में नौगावां जिला अलवर में श्री जिनसहस्रनाम महार्चना का आयोजन हुआ । भक्तों ने भक्ति रस का रसास्वादन कर पुण्यार्जन किया ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
