गांधी का स्वप्न जब सत्य बना – तभी देश गणतंत्र बना.. याद करे उन वीरों को – जिनकी मेहनत से देश महान बना..!अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज
कुंजवन उदगांव
भारत गौरव साधना महोदधि सिंहनिष्कड़ित व्रत कर्ता अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहाँ की गांधी का स्वप्न जब सत्य बना – तभी देश गणतंत्र बना.. याद करे उन वीरों को – जिनकी मेहनत से देश महान बना..!
महाराज श्री ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कहा कि भारत अपनी पचहत्तर वीं वर्षगांठ की ऐतिहासिक सफलताओं के पावन क्षणों में, अमृत काल के प्रथम गणतंत्र दिवस पर अपने देश की सुख शान्ति, समृद्धि, अहिंसा, सदभाव, प्रेम, मैत्री, भाई चारा, नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिकता के विकास के लिये घर में एक घी का दीप जलायें और ख्याति कीर्ति प्रतिष्ठा के लिए एक ध्वजा लगायें।
जानकारी देते हुए पियूष कासलीवाल एवं नरेंद्र अजमेरा ने बताया कि
गणतंत्रता की आराधना के महा महोत्सव में लोक जीवन से लेकर विश्व के कल्याण की संकल्पना का वास है। 
मानव की एकात्मकता से लेकर, राष्ट्रों की एकता का जीवन्त सन्देश है।राष्ट्र के अभ्युदय से लेकर उसकी प्रोढ़ता की गाथा है।

महर्षियों, देवर्षियों से लेकर मनीषियों की वैश्विक मंगल कामनाओं की थाती है। राष्ट्र के लोक मंगल से वैश्विक-शान्ति तक की कामना पूर्ति का आह्वान है। हमारी राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रीय चेतना, और राष्ट्रबोध को समझने का सुनहरा अवसर है। आज
ऐतिहासिक राष्ट्रीय पर्व पर, सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक — भारतीय संस्कृति एवं सभ्यताओं की बहुरंगी विविधता और समृद्ध विरासत के संग बहुआयामी, सामाजिक और आर्थिक प्रगति के पुरूषार्थ की वन्दना और अनुमोदना करने का महान अवसर भी है।

विश्व का सातवां बड़ा देश भारत शेष एशिया से अलग है, इसका गगन चुमती चोटियाँ, करती है प्रशस्ति वादन, पावन-पवित्र मुकुट बन हिमालय गर्वित होता है और सुशोभित होता भाल, सागर इसके चरणों में रहकर निज को करता है पावन, शीतल पवन जीवन दायिनी नदियाँ, कल-कल निनाद करती हुई, जन-जन का पालनहार करते हुये,, गांव, कस्बे और शहर को जोड़ते हुये, करती है पवित्र पावन निर्मल तन को, मन को जोड़ते हुये काश्मीर से कन्याकुमारी, अटक से कटक, भारत के जन के मन को, अन्तर्मन से यह गणतंत्र दिवस प्रतीक है। शक्ति, भक्ति और मुक्ति का देता है बोध। “सर्वे सुखिना भवन्तु” की लय में तत्पर है समर्पित। अखिल विश्व में शान्ति के जयघोष का कर रहा है शंखनाद। संविधान के प्रवर्तित होने की वर्षगांठ का उत्सव लोकतंत्र की जननी रहा है, जिसने अनगिनत चुनौतियों और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना किया। गरीबी, असमानता और निरक्षरता के विरूद्ध संघर्ष किया, पर आशा और विश्वास के साथ खड़ा रहा अविचलित, विविध पन्थों और बहु भाषाओं एवं बोलियों के बीच जुड़ा रहा हर जन मन से, नेह और समय की कसौटी पर खरा उतरा हर बार सदियों
पुराने भारतीय संविधान ने शान्ति, बन्धुता, और समानता के हमारे मूल्यों को आत्मसात कर एक प्रशस्त चिन्तन धारा का प्रवाह दिया और कियाआह्वान आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विश्वतःअर्थात हमारे पास सभी दिशाओं से अच्छे विचार आएं और स्वागत किया हर एक प्रगतिशील विचार का। हमारा संविधान जीवंत है, दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता के मानवता वादी दर्शन की विरासत से होता है गर्वित, तो आधुनिक विचारों से करता है सभी को अभिभूत। इसमें निहित आदर्शों ने निरन्तर हमारे गणतंत्र को सर्वोदय और अन्त्योदय की राह दिखाई, जिसमें विश्व-मन्च पर एक आत्मविश्वास से भरे राष्ट्र के रूप में आज भारत प्रतिष्ठित हुआ है। भारत सबसे तेजी से बढ़ती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन, आत्मनिर्भर भारत का शंखनाद कर रहा है, शिक्षा-और प्रौद्योगिकी के समन्वय से, जिसकी गूँज अन्तरिक्ष तक सुनाई दे रही है। विकास और पर्यावरण के बीच सन्तुलन बनाए रखने के लिए भारत ने प्राचीन परम्पराओं को नई दृष्टि से देखा है, परम्परागत जीवन मूल्यों के वैज्ञानिक आयामों को समझा और समझाया है। प्रकृति के प्रति सम्मान के भाव को संवृद्ध करते हुये अनन्त ब्रम्हांड के सम्मुख विनम्रता भाव को जाग्रत करने के उदात्त चिन्तन को और धरती पर सुखमय जीवन बिताने के लिये जन जन की जीवन शैली के परिवर्तन की संस्तुति भी की है।

इस महान देश की विकास यात्रा में यशस्वी प्रधान मन्त्री महोदय के जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान के घोष ने विकास की नई वर्णमाला सृजित की है, जो हर भारत वासी के लिए गौरव का विषय है।भारत का संविधान सिर्फ एक पोथी नही बल्कि विश्व को देता जीवन्त सन्देश, जीवन की सम्प्रभुता का, भारत के स्वाभिमान का, क्योंकि यह कोटि कोटि जन-गण-मन-सुदिव्य कथ्य है प्रतीक – हमारे महान राष्ट्र की गौरव गाथा का, संगान है हर जन की देश भक्ति का, और अमिट हस्ताक्षर है प्रत्येक जन की भागीदारी का।इस पोथी में बसती है खूशबू खेतों की मिट्टी की, मजदूर के पसीने की, सैनिक के देश भक्ति की, वैज्ञानिकों के पुरूषार्थ की, और द्योतक है प्रेम, अहिंसा, सुख, शान्ति, एकता और अखण्डता के प्रति भारतीय जनमानस के अक्षुण्ण समर्पण और सम्मान की जिससे बन जाती है प्रतीक राष्ट्र की अखण्डता और सम्प्रभुता की। पचहत्तर वें गणतंत्र दिवस को इस बात का भी गौरव सम्प्राप्त है कि भव्य-दिव्य-विज्ञ भारत के निर्माण के प्रतीक राम मन्दिर के लोकार्पण का साक्षी बना।जो देश सिर्फ पूजा स्थल ही नहीं प्रत्युक्त राम के तप, त्याग, संकल्प और समर्पण का लोक प्रतीक बन गया हो, जो सर्व जन हिताय राम राज्य के रूप में भारतीय चेतना का प्रेरणापुंज रहा है।
राम मन्दिर भारतीय चेतना के उन्मेष का वह प्रतिष्ठित प्रतीक बना जो पुनर्जागरण और भारतीय अस्मिता को सांस्कृतिक उत्कृष्टता के गौरव शाली विचार से संवृद्ध कर रहा है, तथा जन जन में राम के गुणों की संस्थापना का आह्वान कर, कह रहा है कि अब राम नाम की चादर ओढ़ने से काम नहीं चलेगा बल्कि जीवन परिवर्तन के लिए राम का आचरण धारण करना पड़ेगा। 
_आज के राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर सम्पूर्ण भारतवासियों से आत्मीय निवेदन करना चाहता हूँ – कि एक दीप जलायें – देश के प्रति आस्था, निष्ठा और विश्वास समर्पण का और देश की सुख, शान्ति, समृद्धि, अहिंसा, सदभाव, प्रेम मैत्री, भाई चारा, नैतिक, धार्मिक और आध्यात्मिकता से सिक्त देश की एकता और अखण्डता के सौभाग्य एवं पुरूषार्थ के प्रतीक अपने घर पर एक ध्वजा लगायें,, यही तप साधक अन्तर्मना की अन्तर्मन से भावना एवं अनन्त शुभसंशाओ सहित आशीर्वाद_ नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
