आर्यिका विज्ञाश्री माताजी के आशीर्वाद से गणेशलाल बोहरा ने दो प्रतिमा के व्रत धारण किये

धर्म

आर्यिका विज्ञाश्री माताजी के आशीर्वाद से गणेशलाल बोहरा ने दो प्रतिमा के व्रत धारण किये
गुंसी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ , गुंसी (राज.) की पावन धरा पर नवनिर्मित व्रती आश्रम में आर्यिका विज्ञाश्री माताजी के आशीर्वाद से गणेशलाल बोहरा ने 2 प्रतिमा के व्रत धारण कर जीवन में कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया ।

बानापुरा मध्यप्रदेश से मनोज छाबड़ा सपरिवार ने गुरु माँ का मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया । शिमला मोटूका वाले निवाई एवं पारस जैन चैनपुरा वाले निवाई सपरिवार ने गुरु माँ की निर्दोष आहारचर्या कराने का सौभाग्य प्राप्त किया ।

 

 

 

तदुपरांत माताजी ने धर्म का सदुपदेश देते हुए कहा कि – अणुव्रत का अर्थ है लघुव्रत। जैन धर्म के अनुसार श्रावक, अणुव्रतों का पालन करते हैं। ‘महाव्रत’ साधुओं के लिए बनाए जाते हैं। यही अणुव्रत और महाव्रत में अंतर है, अन्यथा दोनों समान हैं। अणुव्रत इसलिए कहे जाते हैं कि साधुओं के महाव्रतों की अपेक्षा वे लघु होते हैं। महाव्रतों में सर्वत्याग की अपेक्षा रखते हुए सूक्ष्मता के साथ व्रतों का पालन होता है, जबकि अणु व्रतों का स्थूलता से पालन किया जाता है। अणुव्रत के अनुसार इच्छा बढ़ाना अच्छा नहीं है क्योंकि इच्छाएं अनंत होती है और अनंत इच्छाएं दूसरों के अधिकार का हनन करती हैं और व्यक्ति को क्रूर बना देती है। अणुव्रत का लक्ष्य इच्छाओं का संयम है।

 

 

 

अणुव्रत का तीसरा आधार है करुणा। अणुव्रत के अनुसार जिस व्यक्ति में करुणा होगी उसके लिए दूसरों के दुःख असह्य हो जाएँगे।

वह अपने आचरणों के द्वारा किसी के प्रति क्रूर नहीं बनेगा, अपितु अपने आपको भी इस तरह से ढालेगा कि किसी अन्य को कोई कष्ट नहीं है। उसके सामने सदा यह लक्ष्य रहेगा ।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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