जो मानव मन से कुटिलता को नहीं छोड़ते वह कभी मोक्ष मार्ग नही अपना सकते समय सागर महाराज
गंजबासौदा
विश्व वंदनीय आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज के परम प्रभावक प्रथम दीक्षित शिष्य निर्यापक श्रमण म्यूनिसिपल 108 समय सागर महाराज ने मील रोड महावीर विहार में धर्म सभा को संबोधित किया।
उन्होंने जल की तुलना मानव के मन से की उन्होंने कहा कि जल का स्वभाव शीतल और निर्मल होता है। जल की प्रकृति अग्नि को बुझाने वाली होती है। अपने मुख को जल में देखने के लिए जल शांत होना चाहिए, उसमें तरंग नहीं होना चाहिए। जल की तरह हमें आत्म तत्व की प्राप्ति करने के लिए मन को सरल शीतल एवं शांत रखना चाहिए।



महाराज श्री ने आगे कहा कि जल की तरह हमें आत्म तत्व की प्राप्ति करने के लिए मन को सरल शीतल एवं शांत रखना चाहिए। मन में विचारों की अशुभ तरंगे उड़ती रहेगी तो एकाग्रता को प्राप्त नहीं हो सकते। उन्होंने मोक्षमार्ग को जटिल बताया और कहा कि मोक्षमार्ग थोड़ा जटिल तो होता है। लेकिन कभी कुटिल नहीं होता है। जो मानव मन कुटिलता को नहीं छोड़ते है वह कभी मोक्ष मार्ग नहीं अपना सकते। एक उदाहरण के माध्यम से महाराज श्री ने बताया कि सीधा वृक्ष फर्नीचर आदि कई अपयोग में आता है, लेकिन जो वृक्ष टेढ़े-मेढ़े होते हैं, वे केवल सिर्फ ईंधन में काम आते हैं। कर्मों को नष्ट करने के लिए हमें सम्यक तप का सहारा लेना चाहिए। जिसकी तन में राग द्वेष की लहरें उठ रही हैं वह आत्म तत्व की प्राप्ति नहीं कर सकता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
