17 संतों की जन्म भूमि सनावद में 27 वर्षों बाद अपनी जन्मभूमि पर प्रयोग सागर प्रबोध सागर महाराज का हुआ मंगल आगमन, माता-पिता ने तो हमें संस्कार दिए लेकिन वैराग्य अवस्था का बीजारोपण आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने किया

धर्म

17 संतों की जन्म भूमि सनावद में 27 वर्षों बाद अपनी जन्मभूमि पर प्रयोग सागर प्रबोध सागर महाराज का हुआ मंगल आगमन, माता-पिता ने तो हमें संस्कार दिए लेकिन वैराग्य अवस्था का बीजारोपण आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने किया
सनावद
27 वर्षों के बाद पूज्य मुनि श्री अपनी जन्मभूमि पर प्रयोग सागर प्रबोध सागर महाराज का हुआ मंगल आगमन हुआ इस अवसर पर धर्म सभा में सर्वप्रथम पूज्य मुनिश्री प्रबोध सागर महाराज ने कहा आज जो दिखने में आता है उसे प्रदर्शन कहते हैं। लेकिन अंतर की ओर जो ले जाता है वह दर्शन है। महाराज श्री ने कहा प्रदर्शन के द्वारा ही दर्शन की अनुभूति का सौभाग्य मिलता है। इस घोर पंचम काल में भी इतनी वीतरागता के प्रति इतनी आस्था को लेकर चल रहे हैं। इसे देख बहुत आनंद होता है। यह व्यक्ति विशेष की प्रभावना नहीं है। यह वीतरागता की प्रभावना है। उन्होंने कहा व्यक्ति विशेष की प्रभावना नहीं होती है प्रभावना होती है वीतराग धर्म की। और जो भी उनके प्रति प्रयत्नशील हैं उन्हीं की प्रभावना होती है। आज का वातावरण देखकर ऐसा लगा कि पंचम काल में भी वीतरागता के प्रति अटूट श्रद्धा है। उन्होंने कई उदाहरण के माध्यम से वीतरागता के प्रति समझाया।

 

 

 

इसके बाद पूज्य मुनि श्री प्रयोग सागर महाराज ने अपना उद्बोधन दिया तो सभी भाव विभोर हो गए 27वर्षों के बाद जब पूज्य मुनि श्री प्रयोग सागर महाराज ने अपनी जन्म भूमि पर प्रवचन दिया तो वह बहुत ही भावुक थे और उन्होंने बहुत ही प्रेरणादायक उद्बोधन देते हुए कहा कि दादाजी,माता-पिता ने तो हमें संस्कार दिए और उन्होंने आज संस्कार दिए इसलिए आज हम मुनि अवस्था में हैं।

 

 

महाराज श्री ने आगे कहा उन्होंने कहा साधु संत और सज्जन पुरुष जो होते हैं वह कभी दूसरों ने जो उपकार किए हैं उन्हें कभी भूलते नहीं। आज जहा बैठा हु उस सनावद समाज घर परिवार के प्रति साथ में पढ़े मित्रगण जो यहां बैठे हैं। उन सभी से यह कहता हूं कि यह संकल्प ले की महाराज जी आप जहां भी रहेंगे हम एक वर्ष में एक बार वहा जरूर आएंगे।

 

 

 

 

 

 

 

माता-पिता ने तो हमें संस्कार दिए लेकिन उन संस्कारों की शुरुआत और उन वैराग्य का बीजारोपण जिन्होंने किया वह वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज हैं। उन्होंने कहा मात्र बीजारोपण से कुछ नहीं होगा समय-समय पर उस पर खाद पानी भी आवश्यक होता है। बीजारोपण तो आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने किया एवं उसे खाद पानी देने का काम आर्यिका 105श्री पूर्णमति माताजी ने किया। स्मृति को लाते हुए कहा यह वही धर्मशाला है जहां माताजी का चातुर्मास हुआ था। उनकी प्रेरणा और उनके संस्कारों का ही प्रभाव था कि आज हम इस अवस्था में बैठे हैं। सनावद की जन्मभूमि जिसने ऐसे सपूत दिए जो श्रमण संस्कृति की ध्वजा को फहरा रहे हैं। और सबसे पहले आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज का नाम आता है। और इस जन्म भूमि से महान संतों ने जन्म लिया उसका एकमात्र कारण है क्योंकि यह सनावद की जन्मभूमि तीन सिद्ध क्षेत्र से घिरी है, जिसमें सिद्धवरकूट, ऊन पावागिरी, बावनगजा जिन्होंने सिद्ध पद को प्राप्त किया उनके सिद्ध परमाणुओं का प्रभाव है कि इस निमाड़ की वसुंधरा ने 17 पिछीधारी संतो को जन्म दिया। आगे भी रहेगी। संस्कारों का प्रभाव है कि यह परंपरा आज भी जारी है। उन्होंने जन्मभूमि के प्रति कृतार्थ करते हुए कहा कि जननी मां जन्मभूमि का गौरव स्वर्ग से भी ऊपर है।

राजेश पंचोलिया ने जानकारी देते हुए बताया कि इससे पूर्व पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि108 आचार्य श्री वर्द्धमान सागरजी सहित मुनि श्री चारित्र सागर जी, मुनि श्री अमेय सागर जी,मुनि श्री श्रेष्ठ सागर जी, मुनि श्री अपूर्व सागर जी, मुनि श्री अर्पित सागर जी, मुनि श्री प्रशस्त सागर जी,मुनि श्री प्रबोध सागर जी,मुनि श्री प्रयोग सागर जी,मुनि श्री सुहित सागर जी एवम आर्यिका 105श्री सुदृढ़मति जी,आर्यिका श्री क्षीरमतिजी,आर्यिका श्री तपस्वनीमति, आर्यिकाश्री देशनामति जी,आर्यिका श्री महायश मति जी,आर्यिका श्री पद्मयश मति माताजी एवम क्षुल्लक 105श्री मोतीसागर जी महाराज सहित अनेक प्रतिमाधारीकी गौरवशाली जन्म भूमि, कर्मभूमि, समाधिभूमि
ऐसी पवित्र धर्म नगरी सनावद में

 


णमोकार धाम पर रात्रि विश्राम के बाद नगर प्रवेश नगर में पले, खेले, कूदे, बड़े हुए बचपन से युवा अवस्था में दीक्षित दोनो मुनीराजो की झलक के लिए सभी नर नारी बेताब रहे। मुनि श्री प्रयोग सागर जी एवम मुनि श्री प्रबोध सागर जी का नगर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ।


केवल सनावद ही नहीं निकट के सभी नगरों की समाज बड़वाह, खंडवा, भीकनगांव, इंदौर,बुरहानपुर,पंधाना, बेडिया, महेश्वर, मंडलेश्वर ,धामनोद हजारों की संख्या में समाज जन उपस्थित रहे। जगह जगह घरों के सामने मंगल आरती उतार कर चरण प्रक्षालन किया। अनेक स्थानो पर श्रीफल, मिठाई,सूखे मेवे वितरित किए गए। दोनो मुनिराज ने नगर के सभी जिनालयों के दर्शन किए। सभी की उत्सुकता नजरे महाराज श्री की जन्मभूमि निवास स्थल पर विशेष स्वागत द्वार पर स्थिर रही ।

 

वह क्षण भावुक थे जब गृहस्थ अवस्था के परिजन जल के साथ खुशीयो के नेत्र अश्रु से प्रक्षालन कर रहे थे। जलूस का समापन श्री वर्धमान धर्म शाला में हुआ।दोनो मुनियों के मंच पर विराजित होने पर प्रदीप पंचोंलिया ने भजन मंगलाचरण प्रस्तुत किया।नृत्य मंगलाचरण के बाद बाहर से आए अतिथियों ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी एवम् आचार्य श्री विद्या सागर जी के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया इसके बाद पुण्यार्जक परिवारों ने दोनो मुनीराजो के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेट की। समाज द्वारा इनका स्वागत किया। अनेक नगरों की समाज ने श्रीफल अर्पित कर नगर में आने के लिए निवेदन किया।
राजेश पंचोलिया से प्राप्त जानकारी अनुसार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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