क्यों कहते हैं आपको वात्सल्य वारिघि
सलूंबर
बिरले जीव ही भाग्यशाली होते हैं जिन्हें महान आचार्य के श्री मुख से जिनवाणी और महान णमोकार मंत्र सुनने को मिलता है। आचार्य श्री मुख से नमोकार मंत्र सुनते हुए वेदना रहित होकर, समस्त विकल्पों से रहित होकर, संतोष पूर्वक बिना तडफन के प्राण निकलना बहुत ही दुर्लभ होता है।
प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की परंपरा की पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जीअपने संघ सहित सलुंबर में विराजित हैं ।सलूंबर से नगर के मंदिरों के दर्शन करने संघ ने विहार किया ।

सड़क पर एक वाहन की टक्कर से श्वान कुत्ता जो कि मरणासन्न अवस्था में था उसके समीप बैठकर वात्सल्य वारिघिआचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उसे नमोकार मंत्र का श्रवण कराया



करुणा मय वात्सल्य, ममता से परिपूर्ण द्रश्य देखकर साथ चल रहे श्रावक ही नहीं अपितु अन्य धर्मों के लोग भी ममता को देख कर अभिभूत थे

समस्त जनता इसके लिए नगर में दिगंबर साधुओ की प्रशंसा कर रही हैं ऐसे होते हैं वात्सल्य वारिघि जिनसे मनुष्य ही नहीं तिर्यंच पशुओं का दुःख भी नहीं देखा जाता । इसी कारण आपको वात्सल्य वारिघि की उपाधि भी गौरवान्वित हुई। नमोस्तु गुरुदेव नमोस्तु गुरुदेव।
राजेश पंचोलिया वात्सल्य भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
