अकर्मण्यता ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है सुव्रतसागर महाराज
बीना
परम पूज्य मुनिश्री सुव्रतसागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम सोचते हैं कि संसार में हमारा सबसे बड़े दुश्मन समाज के लोग, दुनिया के लोग हैं, या फिर कर्म सिद्धांत दुर्भाग्य हमारा दुश्मन है।
लेकिन इस पर जैन संतों का सोचना है कि जो व्यक्ति पुरुषार्थ नहीं करता , मेहनत,उधम, उद्योग नहीं करने का स्वभाव भी उसका दुश्मन है। अकर्मण्यता ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है।



श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में धर्म सभा में महाराज श्री ने महाभारत का उदाहरण दिया और कहा कि हमें अपने जीवन में उन शत्रुओ से बचना चाहिए जो हमें दिखाई नहीं देते, और हमारे जीवन में निरंतर हमारा घात करते रहते हैं। हमें करने की योजना बनाते रहना है। हमें पिछड़ने की योजना नीचे दिखाने की योजना नहीं बनानी है। हमारे अंतरघात करने वाले खतरनाक शत्रु कौन है इस बात पर कोई विचार नहीं करता। क्योंकि हम बाहर के शत्रुओं से लड़ने के लिए उन्हें पराजित करने के लिए शक्ति योजना सब कुछ कर सकते हैं किंतु अंतर वाले शब्दों को जो हम जानते ही नहीं उनसे कैसे लड़ेंगे। पुरुषार्थ करना, मेहनत करना, अगर हम छोड़ देंगे तो हमें किसी से शत्रुता माल नहीं लेनी पड़ेगी हम अपने आप में पराजित हो जाएंगे। यही हमारे सबसे बड़े शत्रु है। इसीलिए कर्मठ व्यक्ति को ही सबसे बड़ा सफल व्यक्ति माना जाता है। पुरुषार्थ करने वाला व्यक्ति ही सदा सफलता पाता है।
महाराज श्री ने समझाया कि एक मेंढक और एक मेंढकी थे, दोनों कहीं घूमने गए किसी भोजशाला में पहुंचकर उन्हें एक दही की मटकी दिखाई दी। दोनों उसके मुंह पर जाकर बैठ गए। अंदर का दही देखकर मेंढकी के मन में खाने का विचार आया मेंढक ने बहुत समझाया किंतु वह नहीं मानी। अंत में दोनों उसे मटकी में कूद गए दोनों ने पेट भर के दही खाया। पेट भरने पर मेंढकी ने कहां चलो ऊपर चलें तो मेंढक ने कहा कि अब बाहर जाना संभव नहीं है। अब तो हमें मरना ही पड़ेगा। मेंढकी ने सोचा कि जब हमें मरना ही है तो हाथ पैर क्यों चलाएं। और दही में डूब कर वह मर गई। किंतु मेंढक ने सोचा जब तक हमारे अंदर जान रहेगी तब तक हम पुरुषार्थ करेंगे और उसने मटकी में यहां वहां घूमने प्रारंभ कर दिया। परिणाम यह हुआ कि मटकी में यहां वहां घूमने के कारण उसमें मक्खन निकल आया मक्खन दही में डूबता नहीं है। और इकट्ठा हो जाता है। इसीलिए उस लोधे पर मेंढक उछलकर बैठ गया। और मेंढक की जान बच गई और मेंढकी मर गई।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
