परम पूज्य तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108/सन्मति सागर महाराज के समाधि से दिवस पर भाव भरी अभिव्यक्ति

Uncategorized

परम पूज्य तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108/सन्मति सागर महाराज के समाधि से दिवस पर भाव भरी अभिव्यक्ति
परम पूज्य तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज का आज समाधि दिवस है उनके चरणों मे भाव भीनी विनयांजलि
परम पूज्य तपस्वी सम्राट आचार्य गुरुवर का आज समाधी दिवस है ऐसे महान साधक महान तपस्वी चारित्र चूड़ामणि संत के विषय मे जितना कहा जाये कम होगा कही बार देखा गया रात्रि तीन बजे उठकर एक टांग पर खडे रहकर साधना करना एक उपवास एक आहार वोह भी छाछ और पानी धन्य हो ऐसे निष्प्रह साधक जिनवाणी के ज्ञाता देखा मैने एक छोटे से पाटिया पर अपना विश्राम करना जो एक निष्प्रह साधक ही कर सकता है संघ मे अनुशासन आपको अत्यंत प्रिय था कुंजवन उदगाव वोह पावन स्थान है जहा पूज्य गुरुवर की अंतिम क्रिया हुयी थी
कुछ शब्दों के द्वारा कहूँगा
पूज्य आचार्य श्री त्याग तपस्या के साथ विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। कुंजवन उदगाव की धरा पर जब हम जाते है तो लगता है गुरुवर यही है।

 

 

रामगंजमंडी नगर का पुण्य ही कहा जाएगा वर्ष 1991का वर्षायोग गुरुवर का रामगंजमंडी मे हुआ जो आज भी नगर वासियों की स्मृति पर अंकित है।

आप जन्म से ही शुभ लक्षणों से युक्त होने से ज्योतिषियों ने आपकी जन्म कुंडली देख कर भविष्यवाणी करी थी की ये बालक महान तपस्वी और पुण्यशाली लोक में विख्यात संत होगा। वह हुआ उसी अनुसार आपका नाम ओमप्रकाश रखा गया। 21वर्ष की उम्र में बी.ए. की शिक्षा पूर्ण कर छहढाला,दिव्य संग्रह, श्रावकाचार्य आदि जैन शास्त्रों का अध्ययन कर लिया।

 

 

संक्षिप्त परिचय

जन्म: माघ शुक्ल 7सन 1938
जन्म स्थान : फफोतु (उत्तरप्रदेश)
जन्म का नाम ओमप्रकाश जैन
माता का नाम : जयमाला देवी
पिता का नाम : प्यारेलालजी जैन
शिक्षा : बी ए
दीक्षा गुरु : आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज
मुनि दीक्षा स्थल : सम्मेद शिखरजी सिद्धक्षेत्र
आचार्य पद तिथि: 03-1-1972
आचार्य पद प्रदाता : आचार्य श्री महावीरकीर्ति महाराज
स्थल : मेहसाना (गुजरात)
समाधि स्थल : उदगांव
समाधि तिथि : 24 दिसम्बर2010 को 73 वर्ष की उम्र में

विशेषता :
आचार्य श्री 108 महावीर कीर्ति जी महाराज से 18 साल की आयु में ब्रहमचर्य व्रत लेते ही इन्होंने नमक का त्याग कर दिया ।आचार्य विमल सागर जी से दीक्षा लेकर आपका नाम क्षुल्लक नेमी सागर रखा गया और 24 वर्ष की आयु में कार्तिक शुक्ल 12संवत 2018 सन 1962को मुनि दीक्षा ग्रहण कर सन्मति सागर जी हो गये।1962 में मुनि दीक्षा लेते ही आपने शकर का भी त्याग कर दिया सन 1963 में आप ने चटाई का भी त्याग कर दिया और 1975 में आपने अन्न का भी त्याग कर दिया. सन 1998 में उन्होंने दूध का भी त्याग कर दिया।
संस्मरण

आचार्य श्री के साथ विहार करते हुए सिद्ध क्षेत्र बड़वानी पहुचे वह आचार्य महावीर कीर्ति जी ससंघ भी वहा पहुचा।वही पर आ. महावीर कीर्ति जी का आगमन हुआ और दोनों संघो का गुरु शिष्य का मिलन हुआ और वही चातुर्मास हुआ।आर्यिका विजय मति और आपने आ. विमल सागर जी के पास जाकर निवेदन किया की वो अपने दादागुरु के साथ रहना चाहते है।दोनों की हार्दिक भावना देखकर आपने अपने गुरु से कहा की ये दोनों आपके पास रहकर अध्ययन करना चाहते है आप इन्हें अपने साथ रखे और पढाए।
आचार्य श्री ने अल्पकाल में ही समयसार,प्रवचनसार ,राजवार्तिक आदि अनेक ग्रंथो का अध्ययन कर चारों अनुयोगो के विशेषज्ञ हो गए।आ. महावीर कीर्ति जी ने मुनि सन्मति सागर जी से कहा की तुम मेरे पास आ रहे हो तो सोच लो में जंगली साधु हूँ ,रुखा स्वभाव का किसी की परवाह नही करता मेरे पास कठोर जीवन है,आरम्भ परिग्रह से बहुत दूर हूँ ,ऐसे गुरु के पास रहकर मुनि सन्मति सागर जी ने अपने जीवन में अपने दादागुरु दैनिक परिचर्या में रहकर उनके गुणों को ग्रहण कर अपनी साधना में दिनोदिन उन्नति करने लगे आपके मन में पूरी श्रद्धा थी की जो भक्ति जीव को दुर्गति से बचाती है पुण्य को परिपक्व करती है उसी प्रकार साक्षात मोक्ष प्रदान करने की सामर्थ मात्र विहार कर धर्म की प्रभावना करे । आपका घी ,तेल ,नमक का आजीवन त्याग और 1976से अन्न का आजीवन त्याग कर दिया ।
आचार्य श्री की विशेषताएँ :-

 


आ. श्री त्रियोग रसेन्द्रिय विजय में सम्राट सम तपो में प्रणेता है ;दो, चार , छ: ,आठ ,दस उपवास करना तो आपके लिए सहज ही नजर आता था। कड़ी तपस्या कठोर उपवास में भी आपके दैनिक परिचर्या में किंचित भी शिथिलता नहीं होती। आपके शरीर से अपूर्व आभा अतिशय तेज अपूर्व कान्ति दीप्ति प्रदीप्त होती थी।रात्रि में तेल ,घी की मालिश नही करवाते तब भी तेज मानो टपकता ही नजर आता है यह सब तप का ही प्रभाव है।

 


आपके आचरण में समता का दर्शन होता है। आ. श्री प्रत्येक के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते दम वे निर्धन अथवा धनी में ऊँच तथा नीच में भेद नहीं करते थे।प्रत्येक जीव के प्रति साम्य भाव रखते थे ।आ. श्री में कूट कूट कर विद्वता भरी हुई थींआप सिद्धांत न्याय व्याकरण काव्य छन्द अलंकार ,ज्योतिष ,आयुर्वेद मंत्रो अनेक शास्त्रों का ज्ञान होने पर भी अहंकार से दूर होकर साधना में रहे।
आप जीवन में सादगी मौन प्रिय होकर हित मिता प्रिय वचन कहते थे,आपके उपदेश में सिद्धांत सम्बन्धी उपदेश होता था,जो प्रत्येक जीव के लिए उत्थान साबित हुआ।संघ में कठोर अनुशासन था।

 

आपके दर्शन जो भी कर लेता था, उनकी आँखों में ख़ुशी भर जाती थीं और आपकी वाणी अमृत का कार्य करती तुम
आचार्य श्री ने अपने जीवन काल में कठोर साधना कर चरित्र शुद्धि व्रत,दशलक्षण व्रत,मुक्तावली व्रत ,सर्वसोभाद्र मरण मत्यव्रत ,सोलह कारण व्रत किये । दिनों में केवल 17 दिन आहार लिया. दमोह चातुर्मास में उन्होंने एक आहार एक उपवास फिर दो उपवास एक आहार तीन उपवास एक आहार ………इस तरह बढते हुए, 15 उपवास एक आहार, 14 उपवास एक आहार, 13 उपवास एक आहार ,………..से करतेकरते एक उपवास एक आहार, तक पहुच कर सिंहनिष्क्रिदित महा कठिन व्रत किया.

आपके बारे में आचार्य 108 पुष्पदंत सागर महाराज ने यहाँ तक कहा है की महावीर भगवान के बाद आपने ने इतनी तपस्या की है. 2003 में उदयपुर में मट्ठा और पानी का अलावा सबका त्याग कर दिया. उन्होंने रांची में 6 माह तक और इटावा में 2 माह तक पानी का भी त्याग किया ।आ. श्री को एवं संघस्थ साधुओं को माया नगरी भी आकर्षित नही कर पाई।भोतिक नगरी में दिग. दीक्षा ,आर्यिका ,एलक ,क्षुल्लक ,क्षुल्लिका दीक्षा देकर सल्लेखना पूर्वक समाधी भी करायी ।. गुरुदेव 24 घंटो में केवल 3 चार घंटे ही विश्राम करता थे. वे पूरी रात तपस्या में लगे रहते थे.उन्होंने समाधी से 3 दिन पहले उपवास साधते हुए लोगो का कहने का बावजूद आपना आहार नहीं लिया. अपनी समाधी से पहले दिन यानि 23-12-10 को आपने अपने शिष्यों को पढ़ाया और शाम को अपना आखरी प्रवचन भी समाधी पर ही दिया. और सुबह 5.50 बजे आपने अपने आप पद्मासन लगाया भगवन का मुख अपनी तरफ करवाया और अपने प्राण 73 वर्ष की आयु में 24-12-10 को आँखों से छोड़ दिए और अपना आचार्य पद मुनि श्री सुनीलसागर जी महाराज दिया… आज वर्तमान में उनकी ही प्रतिकृति दिखाई पढ़ती है। . |ऐसे आगम में कठोर तपस्या को सुना करते थे पर हमारा सोभाग्य है की इस कलिकाल में भी हमें तपस्वी सम्राट के दर्शन का सोभाग्य मिला ।

अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी रामगंजमंडी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *