*संयुक्त परिवार समाज की रीढ़ ;- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी*
गुंसी
प.पू. भारत गौरव श्रमणी गणिनी आर्यिका रत्न 105 विज्ञाश्री माताजी ससंघ के सान्निध्य में श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुंसी की पावन धरा पर धर्म का परचम लहरा रही है । प्रतिदिन भक्तगण क्षेत्र पर शांतिप्रभु के चरणों में शांतिधारा करने , गुरु माँ की आहारचर्या कराने व ससंघ की हर क्रिया व चर्या से जुड़ने पहुँच रहे हैं ।
पूज्य माताजी ने सभी को धर्म से जुड़े रहने हेतु धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – किसी भी व्यक्ति के विकास में उसके परिवार का बहुत बड़ा योगदान होता है। बच्चे पर प्रथम प्रभाव परिवार के माहौल का ही पड़ता है। यदि पारिवारिक माहौल अच्छा है तो वह तेजी के साथ मानसिक रूप से सबल होने लगता है। उसकी बौद्धिक एवं आध्यात्मिक क्षमता में सकारात्मक परिवर्तन देखा जा सकता है। इसके विपरीत यदि परिवार का माहौल ठीक न हो तो बच्चा टूटने लगता है। उसका विकास अवरुद्ध होने लगता है। वह मानसिक एवं बौद्धिक रूप से कमजोर होने लगता है।

उसके स्वभाव में नकारात्मकता आने लगती है। वह उद्विग्न रहने लगता है। कभी-कभी वह हिंसक भी हो जाता है। वात्सल्य, ममत्व, स्नेह, त्याग, विश्वास ये सभी परिवार के अधिष्ठान गुण हैं। जिस परिवार के सदस्यों के भीतर ये सब निहित हैं, निश्चित रूप से वह परिवार एक आदर्श परिवार का उदाहरण है। भारतीय संस्कृति एवं जीवन पद्धति में परिवार का विशेष महत्व है।

परिवार रूपी संस्था से ही राष्ट्र के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त होता है। संयुक्त परिवार हमारे समाज की रीढ़ है। वर्तमान में परिवारों का विघटन हमारी पारिवारिक शक्ति को क्षीण कर रहा है।


यह हमारी संस्कृति के मूल्यों से मेल नहीं खाता। इसी कारण आज पारिवारिक तनाव की स्थितियां बढ़ रही हैं। लोग स्वयं को एकाकी महसूस कर रहे हैं। अपनी परेशानी साझा करने के लिए उन्हें कोई मिल नहीं पा रहा। इससे बच्चों की परवरिश पर भी प्रभाव पड़ रहा है। उन्हें दादा-दादी का प्यार और उचित संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे उनके भीतर अपेक्षित मूल्यों का संचार नहीं हो रहा। इससे उनकी बौद्धिक व नैतिक विकास की गति धीमी पड़ रही है। अतः हमें पर्यास करना चाहिए कि हम संयुक्त परिवार के साथ ही रहे ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
