व्रत नियम का पालन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

व्रत नियम का पालन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
सलूंबर
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 31 साधुओं सहित चुंगी नाका जैन बोर्डिंग में विराजित हैं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में सलूंबर की धर्म सभा में बताया कि पश्चिमी सभ्यता के कारण खानपान और वेशभूषा की विकृति से जैन धर्म,संस्कृति ,संस्कार का क्षय हो रहा है,देव ,शास्त्र,संत के समक्ष अब परंपरागत साड़ी और सिर ढकने के बजाय अमर्यादित वेश भूषा खुला सिर समाज के लिए चिंता जनक है।

 

 

 

श्रावक श्राविका भगवान के अभिषेक और आहार दान में भी मायाचारी कर रहे हैं इससे पुण्य के बजाय पाप का अर्जन हो रहा है। भगवान के दर्शन,अभिषेक,पूजन स्वाध्याय से पुण्य का अर्जन होता है।यह मंगल देशना सलूंबर धर्म सभा के प्रगट की। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायश मति जी ने प्रवचन में समाज को पुण्य में वृद्धि करने वाले कार्यों की विवेचना कर उपदेश दिया कि संत का नगर में आना भाग्य है, संत का घर पर आहार के लिए आना अहो भाग्य है, संत को हम याद करें यह हमारा सौभाग्य है, और संत हमें याद करें यह परम भाग्य है,जो इतना समझ कर भी जीवन में सुधार नहीं करें तो उसका दुर्भाग्य है। काफी वर्षों की प्रतीक्षा के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का संघ सलूंबर आया है

 

 

 

 

 

।संत समागम रूपी धर्म की गंगा में नहाने का पुण्य अवसर आपको मिला है ।सलूंबर समाज की धर्म में रुचि है नगर में आठ जिन मंदिर है प्रतिवर्ष संतो के चातुर्मास भी यहां होते हैं ।इसलिए श्रावक के क्या कर्तव्य हैं उसे समझना जरूरी है श्रावक अर्थात जो श्रद्धावन ,विवेक वान ,और क्रियावन हो उसे श्रावक कहते हैं। आचार्य श्री बताते हैं कि श्रावक के मुख्य दो कर्तव्य हैं दान और पूजा प्रतिदिन सभी को जिनेंद्र भगवान के दर्शन ,अभिषेक ,पूजन ,स्वाध्याय करना चाहिए दान और पूजा करने का फायदा बताते हुए माताजी ने बताया कि पूजा करने से मान कषाय पर विजय प्राप्त की जाती है और दान देने से लोभ कषाय का नाश होता है,। अरिहंत देव ,सिद्ध , सर्वज्ञ भगवान के अनंत गुणों की पूजा आप करते हैं । इससे मान का क्षय होता है। चार कषाय हमसे जुड़ी हुई है क्रोध ,मान, माया, लोभ क्रोध तो अस्थाई होता है किंतु मान कषाय जटिल होती है। और माया के कारण मान कषाय उत्पन्न होती है । कषाय कारण खोटी गति प्राप्त होती है ।पुण्य से आपको सच्चे देव शास्त्र गुरु अच्छा कल परिवार और संत समागम मिला है इससे आपको पुण्य बढ़ाने की क्रिया करना चाहिए जितने समय आप देव शास्त्र गुरु मंदिर संत सानिध्य में रहते हैं, आप पाप कर्म से दूर रहते हैं और पुण्य में वर्द्धि होती है माताजी ने पुण्य बढ़ाने के लिए एक सूत्र बताए कि आपको आपकी आमदनी का निश्चित प्रतिशत धार्मिक कार्यों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए उस राशि को यह मानना चाहिए कि वह मेरे उपभोग की नहीं है दान की राशि एक फिक्स्ड डिपॉजिट है जिससे पुण्य का फल हमें इस जन्म में और अगले जन्म में मिलता है।
व्रत नियम का पालन करना चाहिए इससे पुण्य मिलता है व्रत नियम भंग करने से पाप और निम्न गति मिलती है।
राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सल्य भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

 

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