अहिंसा से जीवन बनता चंगा :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
गुन्सी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुन्सी (राज.) में ससंघ विराजित भारत गौरव श्रमणी गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी धर्म साधना में तत्पर है । दिनों – दिन संघ की चर्या उत्कृष्टता की ओर बढ़ रही है । शांतिप्रभु के चरणों में भक्ति करने व गुरु मां के दर्शनार्थ कोटा , देवली , जयपुर , चाकसू , निवाई आदि स्थानों से भक्तगण सम्मिलित हुए ।
पूज्य माताजी ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि – आज वर्तमान में चारों और हिंसा का तांडव चल रहा है। पुराण, गीता, रामायण आदि किसी भी शास्त्र में जीव हिंसा का उल्लेख नहीं है बल्कि रहम, करुणा, दया, जियो और जीने दो, अहिंसा परमो धर्म: आदि नारों का उल्लेख है। माताजी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जो जैसा करता है उसको वैसा ही फल मिलता है। एक लाख योजन सोना दान करने के बराबर एक जीव को जीवन दान देने का फल मिलता है। जिस प्रकार भारत में गंगा का महत्व है उसी प्रकार हमारे जीवन में अहिंसा का महत्व है।



अहिंसा भारत की शान और प्रतिष्ठा है। जब तक भारत और गंगा है तब तक भारत चंगा है, जिस दिन भारत में गंगा उठ जाएगी उस दिन भारत नंगा हो जाएगा। उसी प्रकार जब तक हमारे जीवन में अहिंसा है तब तक जीवन चंगा है।
हिंसा–अहिंसा के स्वरूप का वर्णन करते हुए पुरूषार्थ सिद्धयुपाय में कहा गया है कि आत्मा के परिणामों के राग—द्वेष आदि का उत्पन्न न होना अहिंसा है। जीवों पर दया करना धर्म है। निरन्तर हिंसा का त्याग करना दया है और अपने प्राण त्यागने के समय भी उस ओर लगे हुए मन, वचन, काय के द्वारा वध से दूर रहना हिंसा—त्याग है। जिनेन्द्र भगवान ने हिंसा त्याग को ही धर्म कहा है। धर्म कहा है क्योंकि यह विद्वज्जनों को अतिशय एवम् विस्तृत सुख में पहुँचा देता है। हिंसक प्रवृत्ति निरन्तर उत्तेजित करने वाली प्रवृत्ति है यह प्रवृत्ति सदैव वैर को बाँधे रहती है।इस लोक में वध , बन्ध और क्लेश आदि को प्राप्त कराने वाला है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
