अगर हम सोच कर झूठ बोले तो वह झूठ सत्य जैसा होता है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

धर्म

अगर हम सोच कर झूठ बोले तो वह झूठ सत्य जैसा होता है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी 

परम पूज्य आचार्य श्री 108 आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आनंद की समझ सबको नहीं विषयों में आनंद मान लेते हैं जो आनन्द का कारण नहीं है। इन्द्रिय विषय में आसक्त व्यक्ति उसी में आनंद मानता है उसी में सुख मानता है अभ्यास मन में धर्म की एकाग्रता होना चाहिए अशुभ ध्यान को समझ कर उसे दूर करने का भाव बनाना चाहिए।    उन्होंने कहा लोग बिना सोचे समझे ही झूठ बोल देते हैं यदि व्यक्ति सोचकर झूठ बोले तो वह झूठ सत्य जैसा होता है। बिना सोचे इंद्रिय विषयों का संरक्षण करने के लिए उन्हें प्राप्त करने के लिए हर पल हर क्षण असत्य का सहारा लिया जाता है व्यक्ति उसी में आनंद मनाता है। उन्होंने कहा मोह मन की क्रिया से होता है हम सोचते जाते सोचते जाते और उसी आदत को हम भाव बनाते रहते हैं।उन्होंने चोरी के विषय में कहा कि किसी की गिरी हुई वस्तु, भूली हुई वस्तु छूटी हुई वस्तु को यदि हम ग्रहण करते हैं।हाथ से उठाते हैं उठाने का मन बनाते हैं कुछ पैसे आदि मिले मंदिर में डाल दिए तो वह भी चोरी है।किसी के गिरे हुए पैसे हम किसी दुखी को दे तो वह भी चोरी है। किसी दूसरे के द्रव्य से हम कैसे किसी दूसरे का दुख कैस मिटा सकते हैं। उस पैसे को उठाकर दूसरे की मदद कर आनंद मान रहे हैं। श्रावक और साधु बिना अनुमति के किसी भी वस्तु को ग्रहण नहीं कर सकता।

 

 

 

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में चोरी की परिभाषा अलग है कही हम गए और वहां हमने किसी चीज को उठाया किसी भी वस्तु को बिना अनुमति ग्रहण कर ही नहीं सकते वह भी चोरी है। श्रावक साधु स्वामी के बिना अनुमति के ग्रहण नहीं कर सकता। यदि बिना अनुमति के ग्रहण किया तो वह भी चोरी है। सार्वजनिक वस्तु को इधर-उधर रख देना भी चोरी है। जो हमारा है वह हमारा ही रहेगा जो हमारा नहीं है वह हमारा नहीं है। मिट्टी और पानी दो ऐसी चीजें है जो आप किसी की भी अनुमति के बिना ग्रहण कर सकते हैं। अगर आपको जंगल में भी रुकना है तो वहां के अधिष्ठाता देव की अनुमति लेनी होगी वरना वो भी चोरी होगी।

 

 

 

परिग्रह के विषय में कहा कि मकान धन दौलत होना चांदी आदि से यह सब परिग्रह है। परिग्रह का संग्रह करते हुए यह मानना कि यह भी संयोग है। पुण्य समाप्त होते ही यह मेरा नहीं होगा। पुण्य स्थाई नहीं होता जो कुछ मिला है उसमें पुण्य का हेतु है। जैसे गिरगिट रंग बदलता है। वैसे ही पुण्य भी रंग बदलता है।सोचा मेरा है मैंने कमाया है किसी को नहीं दूंगा तो आप परिग्रह में आनंद मानते हैं। जैन धर्म गहराई में ले जाता है समुद्र की पूरी गहराई में जाकर रत्न लेकर आता है। हमें पीतल में सोने की भ्रांति है। मिट्टी में सोने की भ्रांति है मेहनत करनी पड़ती है परिश्रम करना पड़ता है तब जाकर यह निकल पाती है।

    अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *