अधिक धन में खुशी नहीं :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी

धर्म

अधिक धन में खुशी नहीं :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
गुन्सी

श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुन्सी (राज.) में विराजमान भारत गौरव गुरु माँ विज्ञाश्री माताजी ससंघ धर्म साधना में रत है । प्रतिदिन भक्तगण शांतिप्रभु की शांतिधारा करने हेतु दूर – दूर से क्षेत्र पर आ रहे हैं ।
पूज्य माताजी ने सभी को धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – जीवन में खुश रहना हर व्यक्ति की ख्वाइश होती हैं. हंसते मुस्कराते चेहरे सभी को प्रिय होते हैं. इसके लिए हमें जीवन के सभी हालातों में खुश रहने का प्रयत्न करना चाहिए ।

 

 

 

 

 

लोगों में एक गलत धारणा हमेशा से रहती है कि अधिक धन में ही अधिक खुशी है जबकि ऐसा नहीं हैं. जिन लोगों के पास अपार धन दौलत होती है वे ही सबसे अधिक व्याकुल एवं बैचेन रहते हैं । धन और खुशी का उतना बड़ा सम्बन्ध नहीं है जितना कि हम सोचते हैं ।

 

एक निर्धन व्यक्ति, साधु सन्यासी, आम गृहस्थी जिनके पास जीवन में धन उतना ही होता है, जिससे वे दो वक्त का अपना गुजारा कर सकते हैं वे एक अमीर व्यक्ति की तुलना में अधिक खुश एवं सुखी रहते हैं । यह लोगों की अपनी व्यक्तिगत सोच और नजरिया ही है, कि वे किसमें खुशी के पल खोजते हैं. कुछ अधिक धन कमाकर स्वयं को खुश बनाते है तो कुछ लोग हर स्थिति में स्वयं को खुश या संतुष्ट रखना सीखते हैं.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अच्छी हेल्थ, सकारात्मक विचार इंसान को हमेशा संतुष्ट रखते है संतुष्टि एवं खुशी एक दूसरे के पर्याय है. जहाँ के जीवन के संतुष्टि के भाव होंगे वहा खुशी स्वतः ही आएगी। प्रसन्नता के लिए अच्छा स्वास्थ्य भी जरुरी है. एक स्वस्थ व्यक्ति न केवल स्वयं खुश रह सकता है बल्कि अपने आस पास के लोगों को भी खुशी दे सकता हैं। वही रुग्ण, बिमारी से पीड़ित इन्सान के पास सुख सुविधा के अन्य साधन होने के बाद भी यदि स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो खुश रहना सम्भव नहीं होता हैं.
इस तरह खुशी का राज अच्छे स्वास्थ्य में भी छिपा है हम अपने स्वास्थ्य को अच्छा रखने का प्रयत्न करे तथा इसी में अपनी खुशी को खोजे तो यकीनन अपने जीवन को सुखी बना सकते हैं।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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