पिच्छिका परिवर्तन हुआजन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया*(पंचकल्याणक महोत्सव के दौरान जन्म कल्याणक की क्रियाएं हुई )
घाटोल
– तीर्थंकर वाटिका श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के सामने प्रतापगढ़ रोड एन एच 56 घाटोल जिला बांसवाड़ा (राजस्थान) में सर्वश्रेष्ठ साधक *आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज* के शिष्यमुनि श्री विमल सागर जी,मुनि श्री अनंत सागर जी,मुनि श्री धर्म सागर जी,मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सानिध्य में एवं प्रतिष्ठाचार्य बा.ब्र. प्रदीप “सुयश” भैया जी अशोक नगरके निर्देशन में 16 दिसंबर2023 तक चलने वाले पंचकल्याणक महोत्सव के अंतर्गत 13 दिसंबर 2023 को मांगलिक क्रियाए संपन्न हुई इस कार्यक्रम में प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, प्रवचन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे हैं।पूरे देश से श्रद्धालु आ रहे हैं।है।संगीतकार नीलेश जैन के द्वारा भजनों की प्रस्तुति हो रही है।
जन्मकल्याणक की क्रियाएं संपन्न हुई

इंद्रसभा एवं राजदरबार, इंद्राणी द्वारा प्रथम दर्शन, इंद्र द्वारा सहस्राक्ष दर्शन किया गया।विशाल जन्माभिषेक जुलूस निकाला गया । पिच्छिका की शोभा यात्रा निकाली गई आचार्य श्री की महा पूजन हुई चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन, शास्त्र अर्पण किया गया
पिच्छिका का विमोचन किया गया।




पुरानी पिच्छिका लेने का सौभाग्य इन सभी को प्राप्त हुआ
मुनि श्री विमल सागर जी की सुप्रीम सेठ श्रीमति शुभम सेठ को प्राप्त हुआ
मुनि श्री अनंत सागर जी महाराज की श्री सुरेन्द्र जोदावत श्रीमती सुनीता जोदावत घाटोल को प्राप्त हुआ
मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज की श्री अनिल कुमार कोठारी श्रीमति विष्णु माला कोठारी घाटोल को प्राप्त हुआ
मुनि श्री भाव सागर जी महाराज की श्री राजेश उकावत श्रीमती रीना उकावत घाटोल को प्राप्त हुआ
मंच संचालन मुनि श्री भाव सागर जी महाराज ने किया इस कार्यक्रम में भारत के विभिन्न नगरों से लोग शामिल हुए।


इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री विमल सागर जी महाराज ने कहा कि आचार्य श्री बागड़ जरूर आएंगे,ऐसा भावसागर जी ने कहा है, बहुत से गांव और नगरो से लोग आए हैं, 72 गांव से लोग आए हैं,बहुत धैर्यशाली होते हैं जो पीछे बैठते हैं,सभी जीवो की रक्षा के लिए पिच्छिका होती है,तीन लोक के प्रभु अनमोल होते हैं,तीन रत्न, तीन लोक का नाथ बनाने के लिए होते हैं,मुनि श्री अनंत सागर जी महाराज ने कहा की ग्रंथो में मंगल महोत्सव की महिमा बताई गई है ,तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ,यह बालक तीन लोक का नाथ बनने वाला है, यह बालक तीर्थंकर बनने वाला है, पुण्य की सुगंधि ऐसी होती है,वह साथ नही छोड़ता है, पुण्य शाली का पुण्य साथ होता है ,मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने कहा कि
पिच्छिका परिवर्तन इसलिए होता है*

मोर का औसतन जीवन काल 10 से 25 वर्ष होता है मोर के पंख अगस्त या कार्तिक महीने में झड़ जाते हैं गर्मी आने से पहले यह पंख फिर से आ जाते हैं एक गुच्छे में 150 पंख होते है पिच्छिका और कमंडल मुनि के स्वावलंबन के दो हाथ हैं ,मुनिराज की पिच्छिका में 900 पंख लगते है
। दिगम्बर श्रमण (साधु) संयमी जीवन शैली व अहिंसा महाव्रत के निर्दोष पालन करने के लिए मयूर पिच्छिका को हमेशा अपने साथ रखते है। मयूर पिच्छिका का इतना महत्व है कि साधुजन आवश्यकता न होने पर बिना कमंडल व शास्त्र के तो अपनी अन्य क्रियाऐं कर सकते है परंतु बिना पिच्छिका के सात कदम से ज्यादा नही चल सकते है।
*पिच्छिका का उपयोग ऐसे करते*
दिगम्बर जैन श्रमण संयम उपकरण पिच्छिका का उपयोग अपनी दिनचर्या में प्रतिपल करते है। उठते बैठते, विश्राम करते, चलते, आहार आदि समस्त क्रियाओं में | निरंतर परिमार्जन के लिए पिच्छिका सहायक होती है।
*पिच्छिका परिवर्तन कब किया जाता*
अधिकतर श्रावकजन की सोच होती है कि चातुर्मास समाप्त होने पर दिगम्बर श्रमण की पिच्छिका का परिवर्तन होता है, अपितु यह भ्रांति मात्र है। अर्थात् जब मयूर पंख का स्पर्श करने पर हल्की सी चुभन होती है तब यह पिच्छिका वर्ष भर में कभी भी परिवर्तित की जा सकती है। जब पिच्छिका से परिमार्जन करने में छोटे-छोटे
जीवो की रक्षा नहीं होती है ऐसा विकल्प मानकर पिछिका को आवश्यकता अनुसार कभी भी परिवर्तित किया जा सकता है
*पिच्छिका परिवर्तन कार्यक्रम का आयोजन बड़े पैमाने पर क्यो किया जाता*
नवयुवाओं में धर्म के प्रति आस्था जागृत करने के लिए, बालकों में जैन संस्कारों के बीजारोपण के लिए, वर्तमान के हिंसात्मक वातावरण में अहिंसा के महत्व को दर्शाने के निमित्त से ही पिच्छिका परिवर्तन कार्यक्रम का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है।
*पिच्छिका परिवर्तन कार्यक्रम चातुर्मास समाप्ति पर ही क्यों होते हैं*
चातुर्मास निष्ठापन के समय ही कार्तिक मास के आसपास मोर भी अपने पंखों – को स्वतः छोड़ते हैं। जिससे चातुर्मास के समापन पर नई पिच्छिका के निर्माण के लिए • आसानी से मयूर पंख उपलब्ध हो जाते है,
*पिच्छिका के लिए मयूर पंख ही क्यों*
मयूर पंख में विद्यमान 5 गुणों के साथ ही आगम (शास्त्र) में दिगम्बर श्रमणों के लिए मयूर पंख से निर्मित पिच्छिका का ही उल्लेख किया। है। मोर एक ऐसा पक्षी है जो कार्तिक मास के आसपास स्वतः ही अपने पंखो को छोड़ देता है, अतः मोर को बिना घात किए हुए व पूर्णतः अहिंसा के साथ ये पंख उपलब्ध हो lजाते है। इसलिए इन मयूर पंखो से ही पिच्छिका का निर्माण किया जाता है।
*मयूर पिच्छिका के 5 गुण कौन-कौन से है*
मोर पंख देखने में तो अत्यंत सुंदर होता ही है, साथ-साथ इसमें निम्नलिखित 5 गुण पाए जाते है
1. मृदुता मयूर पंख अत्यंत मृदु होता है किसी कारण से हमारी आंख में कोई छोटा सा तिनका भी चला जाता है तो हमारी आंखों से आंसू आने लगते है परंतु मयूर पंख इतना मृदु होता है कि आंखों में जाने पर भी कोई चुभन नही होती।
2. सुकुमारता मयूर पंख अत्यंत कोमल होता है। इनकी कोमलता के कारण ही परिमार्जन करते समय जो जीव हमें सूनी आंखो से नहीं दिखाई देते उन जीवों की भी | रक्षा करते हुए अहिंसा महाव्रत का पालन किया जा सकता है।
3. रज ग्रहण नही करती दिगम्बर साधु प्रत्येक क्रिया से पूर्व परिमार्जन करते है अर्थात
जो भी वस्तु को उठाते रखते है तब पिच्छिका का उपयोग करते हैं, तब पिच्छिका उस धूल को तो हटा देती है परंतु मयूर पंख उस धूल को ग्रहण नही करते।
4. पसीना ग्रहण नही करती • जब श्रमण, परिमार्जन के दौरान अपने शरीर से पिच्छिका
का उपयोग करते है तब मयूर पंख पसीने को ग्रहण नहीं करते।
5. हल्के – मयूर पंख सुंदर होने के साथ-साथ हल्के भी होते है अर्थात पिच्छिका के रूप में | इनका भार ज्यादा नही होने के कारण ही दिगम्बर साधु इनका उपयोग आसानी से करते है।
*पिच्छिका परिवर्तन पहले ऐसे होता था*
यह पिच्छिका मयूर के पंखों एंव बेंत की लकड़ी से डंडी और रस्सी से बनती है। मोर अपने पंख अपने आप छोड़ती है और श्रावक उठा लाते हैं फिर श्रावक पिच्छी बनाकर साधु को देता है और ब्रह्मचर्य व्रत, रात्रि भोजन त्याग, पूजन आदि का नियम लेकर श्रावक-श्राविका आदि देते हैं और पुरानी ले लेते हैं। यह मृदु होते हैं पंख आँख मे जाने पर भी पीड़ा नहीं होती है। यह साधु का चिन्ह है । (सिम्बाल है) इस पिच्छी के बिना करीब 5-7 हाथ ही चल सकते हैं साधु ज्यादा नहीं। यह सयंम का उपकरण श्रावक पुराना घर मे रखते है जिसे देखकर साधु बनने की प्रेरणा मिलती रहती है ।
*पिच्छिका से परिमार्जन कब किया जाता है*
आगमानुसार प्रत्येक आचार्य संघ, मुनिजन, माताजी को आदान निक्षेपण समिति का पालन करते समय कमंडल को उठाते व रखते समय शरीर को उठाते-बिठाते, लिटाते, करवट बदलते समय, धूप से छांव और छांव से धूप मे आते समय शरीर को पिच्छिका से प्रमार्जित करते है साथ ही देवों के समकक्ष गिने/ माने जाने वाले शास्त्रों को उठाते, विराजमान करते समय, शास्त्र को खोलते व बंद करते समय प्रमार्जित करते है। इसके अलावा अन्य दैनिक चर्या को निर्दोष पालन करने में भी पिच्छिका से परिमार्जन किया जाता है।
*मयूर पिच्छिका के क्या उपयोग हैं*
दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति में प्रत्येक आचार्य, साधु, आर्यिका एलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिकाजी के लिए संयम उपकरण के रूप में मयूर पिच्छिका अत्यंत आवश्यक व उपयोगी है। दैनिक क्रियाओं में परिमार्जन मंगलाचरण, सामायिक, प्रतिक्रमण, आहार, विहार आदि समस्त क्रियाऐं बिना पिच्छिका के संभव ही नही है। किसी भी परिस्थिति में साधुजन बिना पिच्छिका के नहीं चलते हैं
*रजतमय पंचकल्याणक महोत्सव घाटोल*
आगे यह कार्यक्रम होंगे
*तप कल्याणक*
14 दिसंबर 2023 गुरुवार
*प्रातः कालीन बेला*
*06:00 बजे से*- मंगलाष्टक, दिग्बंधन, रक्षामंत्र, शांतिमंत्र नित्यमह अभिषेक, शान्तिधारा, पूजन , जन्म कल्याणक पूजन एवं हवन, आचार्य श्री जी की पूजन
*9:00 बजे* मुनि श्री के प्रवचन
*मध्यान्ह 11.30 बजे* मंगलाष्टक, दिग्बंधन, रक्षामंत्र, शांतिमंत्र, भक्तिपाठ, महाराजा नाभिराय का राजदरबार, युवराज आदिकुमार का विवाह, युवराज आदिकुमार का राज्याभिषेक, 32000 मुकुटबद्ध राजाओं द्वारा भेंट समर्पण, राज्य संचालन, षट्कर्म उपदेश 72 कलाओं को सिखाना, दण्ड व्यवस्था, दण्डनायक की स्थापना, ब्राह्मी सुन्दरी शिक्षा सांसारिक व्यवस्था, नीलांजना नृत्य की प्रस्तुति, युवराज आदिकुमार का वैराग्य, बारह भावनाओं की भव्य प्रस्तुति, लौकांतिक देवों का आगमन, वैराग्य की अनुशंसा, भरत- बाहुबली को राज्य सौंपना सुदर्शन नामक पालकी में आरूढ होकर दीक्षा वन की और प्रस्थानन, दीक्षा विधि, अंकन्यास, संस्कारोपण पूजन , तत्पश्चात् मुनिश्री द्वारा वैराग्यप्रद उपदेश
6:30 बजे*- संगीतमय महाआरती ,शास्त्र प्रवचन
*सांयकालीन बेला*
*रात्रि 7.30 बजे*
सांस्कृतिक कार्यक्रम (सत्येंद्र शर्मा एंड पार्टी दिल्ली द्वारा कार्यक्रम )
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
