इच्छा का निरोध तप है स्वस्तिभूषण माताजी
स्वस्तिधाम जहाजपुर
भारत गौरव, स्वस्तिधाम प्रणेत्री, तीर्थ संवर्धिका, युग प्रवर्तिका, काव्य रत्नाकर, परम् विदुषी लेखिका गणिनी आर्यिका 105 श्री स्वस्तिभूषण माता जी ससंघ वर्षायोग 2025 श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र स्वस्तिधाम में भक्ति से हो रहा है।
स्वस्तिधाम जहाजपुर मे पर्वाधिराज दसलक्षण महापर्व के अंतर्गत श्रावक संस्कार अध्यात्म योग साधना शिविर भक्तिभाव से चल रहा है।

स्वस्तिधाम पर चल रहे दशलक्षण तप आराधना शिविर में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए स्वस्तिभूषण माताजी ने बताया कि जो तपस्या करता है उसे तपस्वी करते हैं आज तप का दिन है स्वेच्छा से छोडा जाय उसे तप कहते है तप शब्द ताप से बना है भाव बदलने के लिए धर्म किया जाता है ताप अग्नि में होता है अग्नि में जो चीज आ जाये वह भस्म हो जाती है या उपयोगी बन जाती है बिना तपे फसल भी नहीं पकती है पेट में पित्त रूपी अग्नि होती है जिससे भोजन पकता है पचता है और शरीर, रस ,खून ,हड्डी, नसे ,मज्जा ,वीर्य बनता है मिट्टी धूप में तपती है। तो खुशबुदार हो जाती है। जिससे हमें फूल फल मिलते है ऐसे ही आत्मा मे लगे कर्मो को समाप्त करने में तप का बड़ा महत्व है भोगों को छोड़ना तप है।

माताजी ने कहा षटखंडागम ग्रंथ मे आचार्य वीरसेन जी ने लिखा “इच्छा निरोधः तपः “अर्थात् इच्छाओ का निरोध करना सबसे बड़ा तप है इच्छाओं का निरोध करने के 12 प्रकार के तप बताये गए हैं अनशन( उपवास) ऊनोदर( भूख से कम खाना) व्रत परिसंख्यान( छोटा संकल्प लेना) रस परित्याग’ विविक्त शय्यासन, काय क्लेश, ये छः प्रकार के अन्तरंग तप व प्रायश्चित ,गलती होने पर प्रायश्चित लेना विनय ,देव शास्त्र गुरु कि विनय करना वैयावृत्य, गुरु व माता पिता की सेवा करना स्वाध्याय, शास्त्रो को भावों से पढ़ना व्युत्सर्ग, मंत्र जाप में ध्यान लगाना शरीर से मन को हटाना और ध्यान मन वचन काय की एकाग्रता से बारह भावनाओं का चिन्तन करना ये छः प्रकार का बाह्य तप है।

इस प्रकार संसार शरीर भोगो से मन हटाकर, अपने मे मन लगाने से तप होता है और कर्मो का नाश होता है बड़े बड़े महा मुनिराज कई- कई महिनों के उपवास की साधना के साथ आत्मा का ध्यान लगाते है इच्छाओ को छोड़ने से कर्म छुटते है और कर्मो के नाश से मोक्ष होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

