आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने आचार्य पद पर आसीन होने के बाद वह इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने वाला अक्षर है। प्रमाण सागर महाराज
पारसनाथ।
शाश्वत सिद्ध क्षेत्र सम्मेद शिखर की तलहटी पर स्थित गुणायतन परिसर में पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के सानिध्य में विश्व वंदनीय आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का आचार्य पदारोहण दिवस मनाया गया।
इस अवसर पर बोलते हुए पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने आचार्य श्री के प्रति गुणानुवाद करते हुए कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने जो आचार्य बनने के बाद कर दिखाया है वह इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने वाला अक्षर है। उन्होंने आचार्य पद जब आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को दिया गया था। उन पलो की स्मृति को बताते हुए कहा कि इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा जब किसी शिष्य द्वारा आचार्य पद न लेने की बात करने पर गुरु द्वारा गुरु दक्षिणा की के रूप में आचार्य पद स्वीकार करने की बात कही गई हो। और आचार्य गुरुवर ज्ञान सागर महाराज ने न केवल अपना आचार्य पद प्रदान किया अपितु अपने सिंहासन से उठकर मुनि दीर्घा में जाकर बैठकर अपने शिष्य से कहा कि मुझे अपना शिष्य बनाएं। उन्होंने कहा कि आज का दिन हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आचार्य ज्ञानसागर महाराज को पता था कि विद्यासागर महाराज में क्या छिपा है। महाराज श्री ने आगे कहा कि आचार्य श्री ज्ञान सागर महाराज ने अपने जीवन के अंत समय में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से कहा था कि अपने संघ को गुरुकुल बनाना।


आचार्य श्री विद्यासागर महाराज बड़े आत्मसाधक एवम श्रेष्ठ साधक है। साधक होना बहुत दुर्लभ है। और श्रेष्ठ साधक होना और भी दुर्लभ है। जिनकी चर्या में मुलाचार एवं समयसार दिखे वह है। आचार्य विद्यासागर महाराज। आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी ने जिन ऊंचाइयों को प्राप्त किया है वह उनकी चर्या है। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने अपनी साधना से पूरे समाज की दिशा को बदल दिया है।

पेड़ बड़ा होता है उसकी छाया उसके फल का लाभ सभी लेते हैं, लेकिन इतना पेड़ बड़ा होने के बाद उसे कितना धूप को सहना पड़ता है। गुरुदेव मुनि दीक्षा एवम आचार्य बनने के बाद इतना चले हैं इतना चले हैं की चलते-चलते खुद राह बन गए। इन वर्षों में गुरुदेव इतना तपे हैं, इतना तपे हैं तपते तपते खुद तप बने है उसका नाम आचार्य विद्यासागर है। अपने त्याग तप के बल पर उन्होंने जिस ऊंचाई का स्पर्श किया है, उसे उन्होंने जैन धर्म की पर्याय बना दिया है। आज जैन धर्म का नाम आते ही आचार्य विद्यासागर का नाम आ जाता है।
उन्होंने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि आचार्य विद्यासागर महाराज जैसे महान आचार्य की छत्रछाया प्राप्त हुई है वर्ष 1999 में गुरुदेव के समुख मुझे कुछ बोलने को कहा गया था तब मैंने कहा था कि गुरुदेव आप जादूगर हैं। कोई युवा पंचम काल में व्यसन की ओर बढ़ जाए तो कोई बात नहीं होगी लेकिन इतने सारे युवा एक साथ आकर मुनि दीक्षा की ओर अग्रसर हो रहे हो यह कोई साधारण बात नहीं है यह गुरुदेव का ही प्रताप है। उनके करिश्माई व्यक्तित्व हर किसी को अपनी ओर सम्मोहित करता है। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज हम सबके लिए इस धरा पर हम सबके लिए तारणहार तीर्थंकर के रूप में प्रकट हुए है। उन्होंने जो हम पर उपकार किया है वह तीर्थंकरों के समान उपकार किया है। मैं गुरुदेव को अपने तारणहार के रूप में देखता हूं। बल्कि सारे संसार के तारणहार के रूप में देखता हूं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
