आज पाश्चात्य संस्कृति देश में हावी हो गई है ऐलक श्री विवेकानंद सागर महाराज
सागर
पूज्य ऐलक श्री 105 विवेकानंद सागर महाराज ने अपने उद्बोधन में पंचकल्याणक महोत्सव के बारे में बताया
उन्होंने कहा कि पंचकल्याणक महोत्सव में पांच कल्याणक होते है, जिसमें सोधर्म इंद्र के साथ समस्त इंद्र पूजन करते हैं। प्रतिदिन एक कल्याणक की पूजा होती है जिसमें प्रथम दिन गर्भकल्याणक की पूजन, द्वितीय दिन जन्म कल्याणक की पूजन, तृतीय दिन तप कल्याण की पूजन, चतुर्थ दिन केवलज्ञान कल्याण की पूजन, पंचम दिन मोक्षकल्याण की पूजन करते है।
उन्होंने कहा कि पाषाण से परमात्मा बनने की यही प्रक्रिया है। उदासीन आश्रम के नजदीक पंचकल्याणक महोत्सव के दौरान अपने उद्बोधन ने बोलते हुए महाराज श्री ने कहा कि पांच महाव्रत धारण करने वाला नियम से ही मोक्ष को प्राप्त होता है। जीवन की रक्षा और सुरक्षा अच्छे से और नियम पूर्वक की जाती है, वही गर्भकल्याणक है। और जन्म कल्याणक सत्य का प्रतीक है, तप कल्याणक बगैर अनुमति के कोई चीज ग्रहण नहीं करता है। उन्होंने कहा कि यह अचोर्य महाव्रत का प्रतीक है।

केवलज्ञान का मतलब अपने में लीन हो जाना, और मोक्ष जाने वाले तीन तीन कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।

महाराज श्री ने विशेष व्याख्या करते हुए कहा कि गर्भकल्याणक की दो दिन होते हैं पहले दिन शोधन की क्रियाएं होती हैं, जिसमें 56 कुमारिया, अष्ट कुमार देवियां माता को धर्म ध्यान कराती है। मरु देवी माता और महाराज नाभिराय नो माह तक साधना करते हैं।




महाराज श्री ने कटाक्ष करते हुए कहा कि आजकल मां-बाप दोष संतान पर थोप देते हैं और अपनी गलती स्वीकार नहीं करते हैं। आज पाश्चात्य संस्कृति देश में हावी हो गई है, इसका अर्थ बताते हुए महाराज जी ने कहा कि पश्चिम में सूरज डूबता है। इस प्रकार जो इसे अपने जीवन में अपना रहे हैं, उनका जीवन अंधकारमय हो रहा है। जो भारतीय संस्कृति को अपना रहे हैं वह उगते सूरज के समान है। और हमेशा ऊंचाईयो पर ही रहते है। और उनका भविष्य उज्जवल है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
