दक्षिण के दो महायात्री
इस बात में कोई संशय नहीं है कि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज एवं त्याग तपस्या साधना की जीवंत प्रतिमूर्ति पूज्य मुनि श्री 108 चंद्रप्रभ सागर जी महाराज निश्चित रूप से महायात्री कहे जा सकते हैं।
क्योंकि यात्रा तो हम सब कर रहे हैं लेकिन संसार में रहकर मानव जाति को धन्य करते हुए मोक्ष मार्ग की और अग्रसर होते हुए यात्रा कर रहे हैं जो निश्चित रूप से महायात्रा ही कही जाएगी। और जो शब्द संयोजन उनके लिए दिया गया है कि दक्षिण के दो महायात्री। जी हा इन दोनों महान व्यक्ति संतों की जन्मभूमि दक्षिण भारत है।





आज जैन धर्म की ध्वजा को पल्लवित किए हुए हैं अहिंसा शांति का संदेश दे रहे हैं और न जाने कितनों को धर्म मार्ग पर अग्रसर कर रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी को भी धर्म से जोड़ने का जो कार्य किया है वह किसी से अछूता नहीं है।
इन दोनों महान संतों के लिए यही कहा जाएगा की।
है यह दक्षिण के महायात्री
जैन धर्म की लादी है क्रांति
पावन दक्षिण की वह धरती है
सारी सृष्टि जिसका वंदन करती है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
