आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज पर विनयांजलि सभा वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सानिध्य में हुई।

धर्म

आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज पर विनयांजलि सभा वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सानिध्य में हुई।
उदयपुर
वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज सानिध्य में आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज पर विनयांजलि सभा हुई।

   

जिसमें उनके जीवन कृतित्व पर प्रकाश डाला गया और उनका गुणानुवाद किया गया प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने जिनवाणी जो की ताड़ पत्रों पर अंकित थी उसके संरक्षण के लिए जिनवाणी के बड़े ग्रंथों को तांबे के पत्रों पर अंकित कराकर जिनवाणी संरक्षण का अनुकरणीय कार्य किया।

 

 

 

 

 

उन्होंने दिगंबर जैन मंदिर में विधर्मी विजातीय व्यक्ति के प्रवेश के कारण इसके विरोध में 1105 दिन तक अन्न आहार का त्याग किया उन्होंने जब दीक्षा ग्रहण की तब उन्होंने पूर्व जन्म के संस्कार के कारण चरित्र को धारण कर दीक्षा ली और अपने जीवन में 36 मूल गुण को धारण कर जीवन को धन्य किया स्वयं के आत्म बल से वैराग्य का मार्ग प्रशस्त किया ।

 

 

आज आचार्य शांति सागर जी महाराज का आचार्य पदारोहण दिवस है आज उनके आचार्य पद को 99 वर्ष पूर्ण हो गए हैं 100 वे वर्ष शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं ।आचार्य शांति सागर जी महाराज ने अपने 40 वर्ष के साधु जीवन में 9938 उपवास किए ।आपने 88 भव्य जीवो को दीक्षा दी। सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए बाल विवाह पर रोक लगवाई ।16 कारण भावना के 16 बार 16-उपवास 16 वर्षों तक किया भोज ग्राम के पास ननिहाल येलगुल में आपका जन्म हुआ किंतु आप भोज में माता के गर्भ में अवतरित हुए अपने अपने आचरण से सरलता से मधुर व्यवहार से भोज ग्राम को चारित्र रूपी प्रीति भोज दिया चरित्र के माध्यम से आत्मा का कल्याण करने की राह प्रशस्त की ।सभी को उनकी बताएं शिक्षा ग्रहण कर श्रावक व्रत का पालन कर जीवन को सार्थक करने का प्रयास करना चाहिए।

 

 

 

उक्त मंगल देशना आचार्य शांति सागर विधान में समर्पित किए गए अर्ध में उल्लेखित प गुणो का वाचन करते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने ने प्रकट की।

 

श्री शांतिलाल वेलावत,पारस चितोड़ा देवेंद्र जैन ने बताया कि आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज को अश्विन शुक्ल 11 को आचार्य पद मिलने के कारण सकल दिगम्बर जैन समाज ने आचार्य श्री शांति सागर विधान की रचना की आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने अपने साधु जीवन में सिंह के ,सर्प के ,चींटी के, मकोड़े के, मानव के अनेक उपसर्गों को समता भाव से सहन किया उन्हें श्रावकों की नादानी से अनेक वर्षों तक आहार में केवल दूध पानी और चावल ही ग्रहण किया।

आपकी आगम अनुकूल चर्या देखकर आपके दीक्षा गुरु ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ग्रहण की इसी कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है।आचार्य श्री ने चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का एक प्रसंग बताया कि वह प्रथम आचार्य होने के बावजूद संसार के सभी साधुओं में अपने को सबसे छोटा मानते थे कहते थे कि मैं तीन कम नौ करोड मुनिराज में मेरा नंबर लास्ट है उन्हें यश नाम कीर्ति की कभी चाहत नहीं रही।

 

शरद कारवां , त्रिशला, नमन ने बताया कि आचार्य शांति सागर शताब्दी महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित सुरसंगम प्रतियोगिता के सफल प्रतियोगियों का आचार्य श्री समक्ष पुरस्कृत किया गया। आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि संगीत से मन में एकाग्रता आती है शांति का अनुभव होता है। आपने आचार्य श्री के जीवन पर गीतो को जन जन तक पहुंचाने की प्रेरणा दी। आज रात्रि को सुखाडिया रंगमंच नगर निगम परिसर में आचार्य श्री शांति सागर जी के जीवन पर नाटिका का मंचन किया गया

राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सल्य भक्त परिवार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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