आचार्य श्री शांति सागर महाराज ने समग्र जीवन में धर्म की सुरक्षा संवर्धन के लिए अपने जीवन को दाव पर भी लगा दिया आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज
उदयपुर
हुमुड भवन में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर महाराज के जीवन कृतित्व एवं उनका गुणगान करते हुए पूज्य वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री 108 वर्तमान सागर महाराज ने कहा कि तीर्थंकर भगवान द्वारा बताई गई चर्या का पालन करते हुए आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने जिन धर्म को सुरक्षित रखने के लिए सूत्र पालन करने का प्रेरणा दी प्रतिदिन पानी छान के पियो, रात्रि भोजन नहीं करो ,देव दर्शन पूजन करो तथा प्रतिदिन शास्त्र का स्वाध्याय आत्मा का चिंतन करो। आचार्य श्री के यह सूत्र जीवन में वैराग्य के बीज का कार्य करेंगे जिस प्रकार भूमि खेत पर बीज बोने से फसल फल की प्राप्ति होती है इस प्रकार तप ,त्याग, संयम से आत्मा में धर्म रूपी बीज मोक्ष फल देता है ।
तीर्थंकरों के बाद गुरु रूप में आचार्य शांति सागर जी प्राप्त हुए उन्होंने समग्र जीवन में धर्म की सुरक्षा संवर्धन के लिए अपने जीवन को दाव पर भी लगा दिया ।तप त्याग संयम से जीवन को चलाया जब भी धर्म पर संकट आया उन्होंने उसकी रक्षा कर धरोहर के रूप में धर्म आपको सोपा है ,इसलिए जिनालय धर्म शास्त्र के प्रति उनकी भक्ति अमूल्य अनमोल है उन्होंने जिनवाणी को ताड़ पत्रों के ग्रंथ जो नष्ट हो रहे थे उन्हें तांबे के पत्रों पर अंकित कराया और प्रकाशित कराया ।



महाराज श्री ने कहा आचार्य श्री ने जब दीक्षा ली तब शास्त्र नहीं थे तो भी उन्होंने निर्दोष रूप से मुनि धर्म का पालन किया उन्हें लगता था कि हम पूर्व जन्म में भी मुनि रहे होंगे पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरणा पाकर मुनि बने ।संस्कारों की रक्षा करना आप सभी का कर्तव्य है।क्योंकि संस्कार सुरक्षित रहेंगे तो अस्तित्व बना रहेगा श्रावक सुरक्षित रहेंगे तो मुनि भी आहार चर्या आहार दान से सुरक्षित रहेंगे ।इसलिए भावी जीवन ऐसा बनाये जहां सुख ही सुख हो ।आचार्य श्री के प्रति आपकी कृतज्ञता यही होगी कि हम उनके उपकारों को नहीं भूले उन्होंने धर्म के
स्वरूप को बताने का अनुष्ठान किया इसलिए संस्कृति और संस्कारों का संरक्षण कर देव शास्त्र गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करें।
आज की मीटिंग का उद्देश्य बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण है दिगंबर जैन समाज ने 100 वर्ष पूर्व श्रमण परंपरा के परम आराध्य गुरु के रूप में प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी को प्राप्त किया ,सन 1924 में समडोली में साधु एवं समाज ने आपको आचार्य पद पर पदासीन कर अलंकृत किया ।आचार्य श्री शांति सागर जी ने श्रमण संस्कृति जिनवाणी जैन मंदिर के लिए अमूल्य महत्वपूर्ण योगदान दिया आचार्य श्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने का अवसर समग्र भारत की जैन समाज के समक्ष आया है ।दुख की बात है कि समाज इतने बहुमूल्य अमूल्य योगदान को भूल रही है सभी नगरों की समाज का प्रथम कर्तव्य और प्राथमिकता होना चाहिए कि वह आचार्य शांति सागर जी महाराज के उपदेश को जन-जन तक पहुंचा आज की बैठक में उपस्थित प्रतिनिधियों को अपने नगर में आज के कार्य योजना की जानकारी सार्थक देनी है कि क्या करना है ,क्यों करना है ,और कब करना है ।कार्य बहुत बड़ा है उसके लिए समाज के सभी संगठनों का सक्रिय सहयोग जरूरी है क्योंकि आचार्य शांति सागर जी महाराज ने अपने दीक्षित 40 वर्ष के जीवन में जैन धर्म मंदिर में विजातीय प्रवेश के विरुद्ध 1105 दिन तक अन्न का आहार ग्रहण नहीं किया । अपने साधु जीवन में सिंह सर्प के अनेक उपसर्ग सहित 40 वर्षों में 9938 उपवास भी किए है।
सुरेश पद्मावत देवेंद्र पारस चितोड़ा ने बताया कि आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के प्रवचन हुए प्रतिष्ठाचार्य हँसमुख जैन धरियावद ने आगामी कार्य योजना की जानकारी दी उन्होंने स्वालंबन योजना,रोजगार प्रोत्साहन, रात्रि पाठशाला,स्कूल रथ प्रवर्तन का सुझाव दिया।
शांतिलाल वेलावत ने स्वागत भाषण दिया संचालन प्रकाश सिंघवी ने किया
इस अवसर पर उदयपुर संभाग के अनेक जिलों के नगरों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे
राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सलय भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
