एकता के सूत्र में बंधो, “महा-शक्ति बनो” विशुद्धसागर महाराज 

धर्म

एकता के सूत्र में बंधो, “महा-शक्ति बनो” विशुद्धसागर महाराज

सागर

आचार्य 108 श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि ” सबके साथ जीवन जियो, समन्जस्य बनाना सीखो, पर सिद्धान्तों को मत छोड़ो। दूसरे के साथ मित्रता करो, पर अपना अस्तित्व मत मिटाओ। जिंदगी जीना भी एक कला है। जो समझोता करना नहीं जानते वह जीवन में विफल हो जाते हैं।”

 

 

 

झगड़ा वही करते हैं, जो नीतिज्ञ नहीं होते हैं। जिसकी एकता, अखण्डता, शांति पर दृष्टि होती है, बहु संग्राम नहीं करती अपितु की समझौता करके सुख पूर्वक जीवन जीता है। दो शक्तियाँ मिलेंगी, एक महा-शक्ति बनेगी। एकता में आनन्द है, एकता में शांति है, एकता में विकास है, एकता में जागृति है। परस्पर-एकता धर्म का प्रतीक है।

 

अच्छे चित्र देखोगे, तो चित्त पवित्र होगा और विकृत चित्र देखोगे तो चित्त चारित्र पतित हो जायेगा। जो चित्त को सँभाल लेता है, उसका चारित्र भी पवित्र होता है।पूर्णज्ञानी, महापुरुष किसी की पूजा करते नहीं, स्वयं की पूजा कराते नहीं, दुनिया उनकी पूजा स्वयमेव करती है। ऐसे ही गुणियों के गुणों की प्रसंशा स्वयमेव होती है।

गुणवान बनो, चारित्रवान बनो, नीतिज्ञ बनो। यथार्थ धर्म समझो; धर्म हमेशा कल्याण का मार्ग ही प्रशस्त करता है। अशुद्धि घटाये, विशुद्धि बढ़ाये वही सच्चा-धर्म है। धर्म खण्ड-खण्ड होने की शिक्षा नहीं देता। धर्म एकता, सामन्जस्य, मैत्री की शिक्षा देता है।

परस्पर की शंका हमारी मित्रता, एकता को घातकर खण्ड- खण्ड कर देती है। आनन्द पूर्वक जीना चाहते हो तो एकता के सूत्र में बंधो। एकता संबंधों का प्राण है। एक-एक धागा मिलकर वस्त्र बन् जाता है। दिया, वाती, घृत और अग्नि मिलकर दुनिया को प्रकाश देते हैं। एकता महा-शक्ति को जन्म देती है। एकता के महत्त्व को समझो। एकता से ही विजय होती है।

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