त्याग को अपनाकर व्यक्ति अपनी सारी विकृति को दूर कर सकता है अजित सागर महाराज
सागर
पूज्य मुनि श्री अजीत सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि समुद्र विशाल है, उसमें जल अपार है, पर उसका जल कोई नहीं पीता है। वह किसी की प्यास बुझा नहीं पाता और सरिता छोटी होती है, उसके पास जल राशि कम है,लेकिन सभी पाथिको की प्यास बुझाती है। क्योंकि सागर का जल खारा होता है। और सरिता का जल मीठा होता है। सरिता बहती है वह त्यागशील है। इसीलिए मधुरता उसके पास होती है। सागर सारी नदियों का जल भर लेता है लेकिन उसे खारा बना देता है।
महाराज श्री ने कहा कि संग्रह वृत्ति वाला व्यक्ति कभी मधुर नहीं हो सकता। और त्यागशील परिणाम वाला व्यक्ति कभी खारा नही हो सकता। त्यागपन आदमी का धर्म है। इसे अपनाकर व्यक्ति अपनी सारी विकृति को दूर कर सकता है।
भारतीय संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में दान और त्याग का बड़ा महत्व है क्योंकि दान परोपकार का उद्देश्य बनाकर किया जाता है त्याग अपनी आत्मा के कल्याण के लिए किया जाता है इसीलिए कहा गया है कि ग्रहस्थ की शोभा दान से है। योगी की शोभा सब कुछ त्याग करके ध्यान से है। सज्जन व्यक्ति धन आने पर भी कभी अभिमान नहीं करते हैं। और हमेशा त्याग करता है। सज्जन व्यक्ति का स्वभाव ऐसा होता है कि जैसे वृक्षों पर फल आते हैं और वृक्ष झुक जाते हैं। नवीन जल से भरे मेघ झुककर बरस जाते है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
