मन की शुचिता से तन शुचि हो जाता है अजित सागर महाराज
सागर
मुनि श्री 108 अजित सागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मन की शुचिता से तन शुचि हो जाता है।
महाराज श्री ने कहा कि अगर शरीर को सुंदर बनाने में लगे हुए हैं तो हमारा मन भी अशुचि बन जाता है। इसीलिए तन को नहीं मन को शुचि बनाओ। वह शौच धर्म का सार है। और हमारे शांतिमय जीवन का आधार है। आदमी को आज पर कम कल पर ज्यादा भरोसा है। लेकिन कल कभी अपना हो नहीं सकता। लोभी अपने बहुमूल्य क्षणों को कल की सोच में बिता देता है। उसका आज भी कल की चिंता में खराब हो जाता है। शौच धर्म का साधक वही होता है जो आज और अब वर्तमान क्षण पर विश्वास रखता है।



महाराज श्री ने कहा कि इसका सदुपयोग करो यह निकल गया तो वापस नहीं आएगा। यही हमारे भविष्य को मंगल में बनाएगा। आपके पास जो है उसमें संतोष रखो। जो तुम्हारा नहीं है उसकी चाह मत करो। चाह की राह मनुष्य के सुख का नाश कर दुख में परिवर्तित कर देती है। इसलिए हम उसे पाने का प्रयास करें जिसमें संतोष सुख और शांति का अनुभव हो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
