जेल में दसलक्षण

धर्म

जेल में दसलक्षण
75 साल हो गए भारत को आजादी मिले क्या आपको पता है कि इतने 75 सालों में क्या नहीं बदला ? जी हां वह अपनी राष्ट्रीयता।

 

 

 

हम जिस घटना का जिक्र कर रहे हैं वह काल्पनिक नहीं अपितु सत्य घटना पर आधारित है। हम जिक्र कर रहे इतिहास के सुनहरे पन्ने की और जी हां जेल में 10 लक्षण आपको सुनकर आश्चर्य जरूर होगा।यह घटना सन 1942 की है। क्या जेल में भी 10 लक्षण पर्व मनाए जाते थे? क्या जेल में भी किसी ने 10 लक्षण पर्व मनाया है? हमारे इतिहास के पन्नों में ऐसी सत्य घटना विद्यमान है। 1901 सन, ग्राम सिलावन, जिला ललितपुर,एक गरीब परिवार में जन्म हुआ20वी शताब्दी के
सबसे बड़े विद्वान का, जिनका नाम था पंडित फूलचंद जी सिद्धांत आचार्य 91 साल के जीवन मे साहित्य सेवा में अनुपम योगदान देने वाले,60 पुस्तकों व ग्रन्थों का प्रणयन/सम्पादन/अनुवाद करने वाले राजनीति में सबको धर्मनीति का पाठ पढ़ाने वाले पंडित फूलचंद जी ने देश के साथ-साथ धर्म को भी सभी के सिरमौर कर दिया था। देशसेवनहिताय आप कई दफा जेल भी गए,वहाँ भी आपने धर्म का साथ नहीं छोड़ा। दूसरे थे श्री बाबूलाल जी पाटोदी आप भी पं. जी की भाँति एक और जिनधर्मसेवी,समाजसुधारक एवं पद्मश्री से सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी हुए। सामान्य परिवार में जन्में बाबूलाल जी एक दिन इस सदी के महानायकों में अपना नाम दर्ज करायेंगे,यह कोई नही जानता था। एक और समाज सुधारक हुए श्री मिश्रीलाल जी गंगवाल मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, “मालवा के गाँधी”,
“भैया जी” नाम से विख्यात, जैन रत्न- जैन वीर। आपने बालकपन में माँ का वियोग का सहा और तभी निर्णय किया कि अब भारत माँ को इस आतंक से मुक्त कराकर रहूँगा।

आप इतने निडर थे कि एक बार जब पं जवाहरलाल जी नेहरू का आपको पत्र मिला कि यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल ढीटो को मध्यभारत का भ्रमण कराना है। जिसके साथ एक दिनचर्या भी थी और भोजन में मांसाहार रहेगा, ऐसा भी स्पष्ट था।यह पढ़ते ही गंगवाल जी ने नेहरू जी को पत्र लिखा और स्पष्ट रूप से मना कर दिया और कहा कि मैं राजकीय अतिथि को शुद्ध एवं शाकाहारी भोजन ही उपलब्ध करा सकूँगा, मांसाहार नही।कृपया मुझे क्षमा करें।”यह भी एक कटु सत्य है की आज के समय मे हम किसी सामान्य राजनेता को भी हम यह नहीं कह पाते उस समय भारत के प्रधानमंत्री को आपने सीधा जवाब दिया। ऐसे अनेकों जैन वीर हुए हैं। छत्रपति शिवाजी के समान अपनी गरिमा बनाए हुए थे।

 

जिनके पराक्रम से ना तो हम-आप परिचित हो पाए ना आम जनता।

 

 

हम मुख्य बिंदु पर गौर करते हैं की जेल में 10 लक्षण पर्व 1942 की बात है,जब ये सभी जन आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे,और संघर्ष कर रहे थे,और जिला जेल, मण्डलेश्वर में कैद थे। लगभग10 से 15 जैन बन्धु जिनमें गंगवाल जी आदि सब शामिल थे।जिनधर्मसेवी होने से देवदर्शन बिना भोजन-जल ग्रहण न करने का नियम था, और उसी समय दसलक्षण महापर्व आ गया था। जा अंग्रेजों के राज में अपनी बात मनवाना मुश्किल था। मैं यह बेचारे तो जेल में कैद थे। सुविधा मिलना सोचने योग्य नहीं था। लेकिन फिर भी सभी जैनियों ने अहिंसा सत्य के बल पर अंग्रेजों के सामने अपनी बात रखी अपनी बात मनवाई। जिसके फलस्वरूप पास ही के एक जैन मंदिर से जेल में प्रतिमा जी लाने की अनुमति प्राप्त हो गयी, जिसका प्रतिदिन सभी जैन श्रावक मिलकर प्रक्षाल- पूजन किया करते थे। जेल में ही दोपहर में तत्त्वार्थसूत्र का पाठ शाम के समय सामयिक जैल में दसलक्षण पर्व के दिनों में स्वयं शुद्ध भोजन बनाकर
दिन में एक बार ग्रहण करते थे। यह बिल्कुल सत्य घटना है जो इतिहास में वर्णित है। ऐसा एक बार नही बल्कि 2 बार हुआ की जैन लोगों ने मिलकर जेल में दसलक्षण महापर्व मनाया हो। एक बार जिला जेल, मंडलेश्वर सन् 1942 में, दूसरी बार केन्द्रिय कारागार, इंदौर सन् 1943 में हुआ। अत्यंत गर्व का अनुभव’ होता है की ऐसे थे हमारे वीर जैन साधर्मी,ऐसी कथाएं जब पढ़ते-सुनते है तब अत्यंत गर्व होता और स्वयं पर लज्जा भी आती है कि उस समय में जब ये लोग अपना जैनधर्म नहीं भूले तब आज के समय मे,जहाँ इतने साधन मौजूद है, वहाँ हम अपना नियम-संयम कैसे पालन नहीं कर पाते..?

 

 

 

 

 

यह एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है की उन्होंने जेल में भी दसलक्षण महापर्व मनाया हमघर से मंदिर जी जाने में भी हिचकिचाते हैं ये जैन वीर हमारे लिए आदर्श हैं,अनुकरणीय हैं।
इन जैसे वीरों के कारण आज हम स्वयं को जैन कहलवाने में गौरव का अनुभव करते हैं ।अंग्रेजों का विरोध सहते हुए भी उन्होंने अपनी बात को मनवाया और जेल में ही.10 दिनों के लिए जिनमन्दिर स्थापित कर दिया. और10 दिनो के लिए स्वाध्याय भवन का निर्माण कर दिया। और 10 दिनों के लिए शुद्ध भोजनशाला बना दी। जैनियों में इतनी सामर्थ्य पहले भी थी और आज भी हम अत्यंत सामर्थ्यवान हम जैनी हैं.हम अपने सभी सामाजिक विवादित मुद्दों को एकतरफ रखते हुए जिनधर्म की शक्ति का परिचय विश्व को करायें। हमारा उद्देश्य और संकल्प एक ही होना चाहिए सभी जेनी भाई एक सुर में कहे मुझे अपने जैन होने पर अत्यंत गर्व है.
सयंम जैन शास्त्री दिल्ली से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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