चरित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज समाधी दिवस

धर्म

चरित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज समाधी दिवस
सम्यक समता के धारी नमन तुमको शांति सागर हमारी जिनशासन के उन्नानायक तपोनिधि साधक शांति सागर गुरुदेव आप जैसे युग पुरुष के कारण जैनधर्म सुरक्षित और जयवंत जितनी गौरव गाथा जितना वर्णन आप पर लिखा जाये आप पर कम है आपने अपने मुनि जीवन के 35 वर्ष व्यतीत किये जिसमे 25 वर्ष 8 मॉस उपवास मे व्यतीत किये बताये ऐसा निष्प्रही साधक
सन 1955 मे 35दिन की आपकी सलेखना चली और अंत समय कुंथलगिरी सिद्ध क्षेत्र पर आपकी समाधी हुयी आपका गृहस्थ का नाम सातगोडा पाटिल था आप जहा रहते थे वहा नदिया ही नदिया थी तब सातगोडा खुद कधे पर बिठाकर साधू संतो को नदी पार कराते और यही कहते की मुझे भी भव सागर पार करा देना आप इतने बल शाली थे की आपशिखर जी यात्रा पर गये तब एक वृद्ध महिला को अशक्त देख उनको आपने अपने पर बिठाकर वंदना करवाई

 

 

 

 

एक समय आचार्य श्री द्रोणागिरी आहार समय विलब से आये तब लोगो ने कहा आप ध्यान ज्यादा लगा गये तो मुस्करा कर बोले इक प्राणी धर्म चर्चा हेतु आ गया तो लोगो ने कहा कौन तो मुनि श्री बोले शेर ऐसे निर्भीक निडर साधक
मुनि श्री ने जिनधर्म के गौरव को जयवंत रखा इसका प्रतक्ष्य उदहारण दिली वर्षायोग के दोरान पंडित जगमोहन शास्त्री वहा आये तो उन्होने कुछ बात देखली मुनि श्री को शिकायत कर दी की कहा महाराज श्री ये आपके साथ भक्ति से नहीं चलते इसके पीछे बड़ा रहस्य है मुनि श्री कहा क्या पंडित जी बोले ये आपको छुपा कर चलते है मुनि श्री बोले क्यों पंडित जी बोले यहाँ ब्रिटिश शासन है

 

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यहाँ कोई नग्न अवस्था मे नहीं चल सकता इसलिये आपको छुपा कर चलते है तो मुनि श्री बोले जब तीर्थंकर काल मे मुनियों का विचरण होता था तो इस शासन मे क्यों नहीं तो मुनि श्री ने कहा “कानून बदला जा सकता है धर्म मे वोह प्रभाव है” तब मुनि श्री ने कड़क आदेश दिया मेरे साथ सिर्फ एक व्यक्ति ही चलेगा कमण्डलु लेकर गुरु आदेश था सब चुप थे व्यक्ति के साथ मुनि श्री निकले तो पुलिस ने रोका तो आपने कहा मे दिगंबर साधू हु तो पुलिस ने कहा आप नहीं जा सकते तो मुनि श्री बोले मे वापस जा सकता हु तो पुलिस बोली नहीं तो महाराज श्री ने कहा मै यही ध्यान पर बैठता हु होना क्या था वहा जाम लग गया अपार भक्तो का हजूम वहा बडे पुलिस अधिकारी वहा आ गये तभी एक प्रान्त मे ये कानुन पास हो गया ही दिगंबर साधू को कोई नहीं रोक सकता
इसी तरह आपने जिनशासन गौरव उच्चा रखा
सदा सदा ऐसे निष्प्रही साधक की गौरव गाथा अमिट रहेगी
शत शत नमोस्तु
अभिषेक जैन रामगंजमंडी

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