मन्दिर भगवान को धन्यवाद देने का पवित्र स्थान है.. लेकिन हमने उसे मांगने का कार्यालय बना दिया.. अंतर्मना प्रसन्न सागर महाराज पदम प्रभु भगवान मंदिर का हुआ शिलान्यास
कुंजवान उदगांव
अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज के सानिध्य में पदमप्रभु भगवान् जिन मंदिर का भूमि पूजन एवं शिलान्यास संपन्न हुआ।
नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल ने बताया कि पूज्य आचार्य श्री के सानिध्य में भूमि पूजन एवं शिलान्यास की समस्त क्रियाएं विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर महाराज श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि मंदिर भगवान को धन्यवाद देने का पवित्र स्थान है, लेकिन हमने उसे मांगने का कार्यालय बना दिया।

एक उदाहरण के माध्यम से महाराज श्री ने समझाया कि आपने कभी ध्यान दिया हो जब शादी होती है तो लड़का – लड़की की एक बार मांग भरता है और वह लड़की ज़िन्दगी भर पति से मांगती है। आदमी जीते जी औरत की मांग पूरी नहीं कर पाता। जब भी पुरूष घर जाता है तो पत्नी, पति से कहती है – अरे सुनो जी! हमारी मांग पूरी करो, जब पति उसकी मांग पूरी नहीं कर पाता तो पत्नी कहती है – किसने कहा था मेरी मांग भरो – अब भरी है तो पूरी करो और आदमी जीते जी उसकी मांग पूरी नहीं कर पाता।
सुख दुःख ओर कुछ नहीं सब मन का समीकरण है।जब मन अच्छा होता है तो घर ही स्वर्ग सा लगने लगता है और जब मन दुखी, परेशान होता है तो घर से बड़ा नर्क ओर कहीं नहीं नजर आता। इसलिए हजारों प्रश्नों का एक ही समाधान है — मन। मानव का मन किसी प्रयोगशाला से कम नहीं है। आदमी का मन समुद्र की लहरों की तरह होता है, जिसमें इच्छायें लहरों की नृत्य गान करती रहती है।
मन चन्द्रमा की तरह घटता बढ़ता रहता है – कभी अच्छा, तो कभी बुरा सोचता रहता है, कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक विचारों से भर देता है। आज के मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह गलत जल्दी सोचने लगता है और वैसे भी आदमी अपनी औक़ात से ज्यादा सोचता है।किसी विचारक ने क्या खूब लिखा — हम मनुष्य है, इसलिए सोचते हैं, यदि गधे होते तो नहीं सोचते। आचार्यों ने मन के दस लक्षण बताये हैं, जिसमें उसे बन्दर सा चंचल और और अंगद के पैर सा अडिग बताया है। संसार के सारे संकल्प और विकल्प मन से ही संचालित होते हैं, इसलिए एक मन को साधो तो सब कुछ सहज हो जायेगा, अन्यथा यह मन जीना हराम कर देगा…!!!
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
